पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१७६

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( १५६ ) है । पद को चूनता से अभिप्राय जरा देर से खुलता है । जब जल घटने लगता है । तब ताल को गोलो मिट्टो सूखकर फट जाती है । कवि का अभिप्राय है कि जिस प्रकार जल घटने से ताल फट जाता है उसी प्रकार यदि यौवन के ह्रास से प्रिय से जी न फटेप्रोति वैसी ही बनो रहे तो कोई हर्ज नहीं । कुछ और उदाहरण लीजिए (क) हाथ लिए प्रापन जिड होई । (ख) ग्रवा पवन विछोह कर, ताप परा वेकरार । तरिवर तजा जो चरि कै लागे केहि के डार है । दूसरे उदाहरण में किसी को डाल लगना' यह मुहाविरा अन्योक्ति में खूब ही बैठा । लोकोक्तियों के भो कुछ नमूने देखिए है। (क) सुधी बें रि न निकले घीऊ । ख) दरव रहै भ , दिपें लिलारा । (ग) तुर रोग हरि माथे जाए । (घ) धरती परा सरग को चाटा । जायसो को काव्य रचना स्वच्छ पर के होने भी तुलसो समान सुव्यवस्थित नहीं । उसमें जो वाक् दोष मपतः दिखाई पड़ता। है ‘द वह ध नपदत्व ' है । विभ- क्तियों का लोष, संबंधवाचक सर्व तामों का लोष, अठग्रयों का लोष जायसा म बहत मिलता है। । वि भक्ति या कारकचिन का ध्याहार तुल तो को रचनाओं में कहीं कहीं पर उन्होंने लोष या तो ऐसा किया । है जैसा बोल चाल में भी करना पड़ता है, प्रायः होता है बहुत जल्द लग जाता है । पर जायसो ने मनमाना लोष किया है--विभक्तियों का जैसे सप्तमो चिह्न -प्रसंग के का—अथवा लुप्त चिह्न का पता से ही नहीं, सर्वनामों, अव्ययों का भो। कहीं कहीं तो इस लोष के कारण प्रसादगुण बिलकुल जाता रहा है औौर अर्थ का पता लगाना दुष्कर हो गया , हैजैसे सरजे लीन्ह साँग पर याऊ । परा ख ग जनु परा घिहाऊ ! इसमें दूसरे चरण का अर्थ शब्दों से नही निकलता है कि ‘ख ड्रग एंसा पड़ा मानों निहाई पड़ो ।' पर कवि का तात्पर्य यह है कि ‘खड्ग निहाई पर पड़ा। देखिए इस ' लोप से अर्थ में कितनी गड़बड़ी ‘परके पड़ गई । विभक्ति औोर कारक चि न के बेढंगे लोष के औौर ननू ने देखिए (क) जंघ छपा कदलो हो ारो। (ख) करन पास लोहे के खंदू ? (ऋष = जंघ से) उ पास = ग्रव्यों का लोष प्राथः मि ा ता (पास से) भो है-नौर जिज कभो कभो कुछ देर लगतो जैसे -ऐसा ससे अर्थ समझने में भी है, (१) तव त, च है फिर नो मैं । (फि* = जघ फि) (२) दरपन साहि भोति त , लावा । देहूँ ज दि झरोखे ावा । ।