पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१८०

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( १६० ) है उसके अनुरूप प्रेम की व्यंजना के लिये एक मनुष्य का क्षुद्र हृदय पर्याप्त नहीं जान पड़ता, इससे कहीं कहीं वियोगिनी सारी सृष्टि के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई पड़ती है । उसकी प्रेमपीरसारे विश्व की ‘प्रेमपीर' सी लगती है । (३) मर्मस्पशिनी भावयंजना प्रेम या रति भाव के अतिरिक्त स्वामिभक्ति, वीरदर्पपातित्रत तथा औौर छोटे भावों की व्यंजना अत्यंत स्वाभाविक औौर हृदयग्राही रूप में जायसी ने कराई जिससे उनके हृदय की उदात्त त्ति औौर कोमलता का परिचय मिलता (४) बंधसौष्ठव पद्मावत की कथावस्तु का प्रवाह सवभाविक है । केवल कुतूहल उत्पन्न करने के लिये घटनाएँ इस प्रकार कहीं नहीं मोड़ी गई हैं जिससे बनावट या ग्रलौ किकता प्रकट हो । किसी गुण का उत्कर्ष दिखाने के लिये भी घटना में स्वा भाविकता जायसी ने नहीं आने दी है । । दूसरी बात यह है कि वर्णन के लिये जायसी ने मनुष्यजीवन के मर्मस्पर्शी स्थलों को पहचान कर रखा परिणाम वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे संसार में दिखाई पड़ते हैं। । कर्मफल के उपदेश के लिये उनकी योजना नहीं की गई है। । पद्मावत में राघवचेतन ही का चरित्र खोटा दिखाया गया । है, पर उसकी कोई दुर्गति कवि ने नहीं दिखाई। राघव का उतना ही वृत्त आया है जितने का घटनाओं को कार्यकी घोर अग्रसर करने में योग है। । (५) वर्णन की प्रचुरता जायसी के वर्णन बहुत विस्तृत हैं--विशेषतः सिंहलद्वीप, नखशिखभोज, बारहमासा, चढ़ाई और युद्ध के–जिनसे उनकी जानकारी और वस्तुपरिचय का अच्छा पता लगता है । कहीं तो इतनी वस्तुएँ गिनाई गई हैं कि जी ऊब जाता है । (६) प्रस्तुत अप्रस्तुत का सुंदर समन्वय पद्मावत की अन्योक्तियों और समासोक्तियों में प्रस्तुत अप्रस्तुत का जैसा सुंदर समन्वय देखा जाता है वैसा हिंदी के कम कवियों में पाया जाता है । अप्रस्तुत की व्यंजना के लिये जो प्रस्तुत वस्तुएँ काम में लाई गई हैं औौर प्रस्तुत की व्यंजना के लिये जो अप्रस्तुत वस्तुएँ सामने रखी गई हैं वे आवश्यकतानुसार कहीं बोधवृत्ति में सहायक होती हैं औौर कही भावों के उद्दीपन में । योगसाधकों के मार्ग की जो व्यंजना चित्तौरगढ़ के प्रस्तुत वर्णन द्वारा कराई गई है, वह रोचक चाहे न हो पर ज्ञानप्रद है। अवश्य । इसी कंवल विगसा मानसर विनु जल गएड सूखाइ प्रकार जो वाले सौंदर्य दोहे को भावना में जो जल के साथ बिना साथ सूखते दया औौर का सहानुभूति प्रस्तुत दृश्य के भाव सामने को उद्दीप्त गया करता हैहै । कमल रखा वह (७) ठठ अब धी का माधुर्य जायसी ने संस्कृत के सुंदर पदों की सहायता के बिना ठेठ अवधी का भोला भाला माध र्य दिखाया है, इसका वर्णन प्रकरण है । पूर्व में श्रा चुका जिस प्रकार जायसी के उपर्युक्त गणों और विशेषताओं की घोर पाठक का ध्यान गए बिना नहीं रह सकता उसी प्रकार इन नीचे लिखी त्रुटियों की ओर भी