पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४४३

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उपसंहार ७ ७ में हि मुरथ पंडितन्ह बूझा। कहा कि हम्ह किडु औौर न सूझ ॥ चौदह भुवन जो तर मानुष के उपराहीं , ते सब घट माहीं । तन चितउरमन राजा कीन्हा। हिय सिंघलबुधि पदमिनि चीन्हा ॥ गुरू देखावाबिनु गुरु पावा सुथा जेइ पंथ । जगत को निरगुन । नागमतो यह दुनिया bjधा। बाँच सोइ में एहि चित बंधा ॥ शघव दूत सोई संतान । माया अलाउद सुलतान प्रेम कथा"एहि भांति विचारह। बूड़ेि नेह t a के पार I। तुरकी, अरबी, हिनूई, भाप जेनी चाहि। जहि महें मार, प्रेम कर, सवै सराहें हि ॥ १ । मुहमद कबि यह जोर पीर सुनावा। सूना सो प्रेम कर पावा ॥ ज लाइ रकत ° लेईप्रीति । के । गाडि नयनन्ह जल भेई ग्री में जानि अस कीन्हारहै चोन्हा गीत मक यह ॥ । जगत महें कहाँ सो रतनसेन अब राजा ? । कहाँ स ा अस वृधि उपराजा ? । कहें सूप पदमावत रानी ?। कोइ न रहा, जग रही कहानी कह अलाउद्दीन सुलता । ? कहें राघव जइ कीन्ह बखान है । धनि सोई जस कीरति जासू । फूल मरेपे मरे न बास केइ न जगत जस वेंचा, केइ न लीन्ह जस मोल ? । जो , सँव दुइ बोल ॥ यह पढ़ें कहानीहम्ह मुहमद बिरिध भईजोबन अवस्था गई । बैंस जो । हुत, जो ॥ बल ो गएड के खीन सीरू । दिस्टि गई नैनहि देइ नीरू । दसन गए है पचा कपोला। वैन गए अनरुत्र देइ बोला। । (१) एहि = । = पंडितों से इसका पंडितन्ह । कहां-=उन्हो सू१ । पहीं = अपर। कहाहमें तो सिवा इसके और कुछ नहीं सूझता है कि निरगन ब्रह, ईश्वर (२) । जोरी लाइन भई इस कविता को मैंने रक्त व लेई लगाकर जोड़ा है और गाढ़ी प्रीति को आंसुओं से भिगो भिगोकर अब गीला किया । चीन्हा = चिह्न, निशान है । उपराजा = उत्पन्न किया । । बुदिी उपराजा = जिसने राजा रत्नसेन के मन में एसो वृद्ध उत्पन्न की। केइ न जगत किसने जस बें ला = इस संसार में थोड़े के लिये अपना यश नहीं खोया ? अर्थात् बहुत से लोग ऐसे हैं । हम्ह सरे = हमें याद करे। दुइ बोल = दो शब्दों में, दो बार। (३) पचा = पिचका हुआ। । = । अनरुच अरुचिकर बौराई = बावलापनजैसेकरत फिरत बौराई ।- तुलसी।