पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/५०

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( ३० )

( ३० ) अस परजरा विरह कर गठा । मेघ साम भए धूम जो उठा ॥ दाढ़ा राहुकेतु गा दाधा । सूरुज जराचाँद जरि आाधा ॥ ऑों सब नखत तराई जरहीं । ट्ह लक, धरति मह परहीं । जरै सो धरती ठावहि ठाऊँ। दहकि पलास जगे तेहि दाऊँ। ॥ इन चौपाइयों में मेघों का श्याम होना, राहु केतु का काला (झुलसा सा) होना, सूर्य का तपना, चंद्रमा की कला का खंडित होना, पलाश के फूलों का लाल (दहकते अंगारे सा) होना आादि सत्य हैं । वे विरहताप के कारण ऐसे ह, केवल यह बात कल्पित है । ताप के अतिरिक्त विरह के औौर औौर अंगों का भी विन्यास जायसी ने इसी हृदयहारिणी औौर व्यापकत्व विधायिनी पद्धति पर बाह्य प्रकृति को मूल धाभ्यंतर जगत् का प्रतिबिंब सा दिखाते हुए किया है । काम हेतृत्प्रेक्षा से लिया गया है । प्रेमयोगी रत्नसेन के विरहव्यथित हृदय का भाव हम सूर्यचंद्र, वन के पेड़, पक्षी, पत्थर, चट्टान सबमें देखते चलते हैं रोवं रोवें वे बान जो फूटे 1 सूतदि सूत रुहिर मुख लूटे । नैनहि चली रकत के धारा । कंथा भीौजि भएउ रतनारा ॥ सूरज बूड़ि उठा होइ ताता। श्री मजीठ टेसू बन राता ॥ भा बसंत, राती बनसपती । औी राते सबजोगी जती ॥ भूमि जो भीजि भएउ सब गेरू। नौ रात तहें पंखि पखेरू ॥ राती, सती, अगिनि सब काया। गमन मेघ राते तेहि छाया ॥ ईगुर भा पहार जौ भोजा। प तुम्हार नहि रोवं पसाजा ॥ इसी प्रकार नागमती के आंसुओं से सारी सृष्टि भींगी हुई जान पड़ती है कुहुकि हुकि जस कोइल रोई । रकत ग्राँसू शृंघची बन बोई ॥ जह जद ठाहि होई वनवासो। तहूँ तहें होइ घचि के रासी ॥ व द व द महें जानतें जीऊ। गंजा ग"जि करें, पिउ पीज' ॥ तैति दुख भए परास निपाते । लोढ़ चूड़ेि उठे होइ राते ॥ राते बिब भीजि तेहि लोह । परवर पाक फाट हिय गोहूँ ॥ विरहवर्णन में भक्तवर सूरदास जी ने भी गोपियों के हृदय के रंग में बाह्य प्रकृति को रेंगा है । एक स्थान पर तो गोपियों ने उन उन पदार्थों को कोसा है जो उस रंग से कोरे दिखाई पड़े हैं मधुबन ! तुम कत रहत हरे ? बिरह वियोग श्याम दर के ठाढ़े क्यों न जरे ? कौन काज ठाते रहे बन में; काहे न उकठि परे ? नागमती का विरहवर्णन हिंदी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है । नागमती उपवनों के पेड़ों के नीचे रात भर रोती फिरती है । इस दशा में पशु, पक्षी, पेड़, पल्लव जो कुछ सामने जाता है उसे बह अपना दुखड़ा सुनाती है । । वह पुण्यदशा धन्य है जिसमें ये सब अपने सगे लगते हैं और यह जान पड़ने लगता है कि इन्हें ।