पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/७१

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( ५१ ) रत्नसेन के कष्टों की सूचना मिली है, तब उसका हृदय उसकी ओोर थाकर्षित अतः पद्मावती के हृदय में पहले दया का भाव हो स्वाभाविक उर्वशी औौर पुरूरवा का प्रेम प्रारंभ ही से सम था, केवल एक दूसरे के प्रेम का परिझान नहीं था आगे चलकर रत्नसेन जो हर्ष प्रकट करता वह तुल्यानुराग पर है। राजा रत्नसेन को जब सूली देने ले जा रहे थे तब हीरामन पद्मावती का यह फंदेसा लेकर माया काढ़ि प्रान बैठी लेइ हाथा मजे तौ, मरींजिनों एक साथा इतना सुनते ही रत्नसेन के हृदय से सूली नादि का सब ध्यान हवा हो जाता वह प्रानंद में मग्न हो जाता। सुनि वृंदेस राजा तव हंसा प्रान प्रान घट घट महें वसा प्रेम के प्रभाव से प्रेमी की वेदना मानो उसके हृदय के साथ प्रिय के पास चली जाती है । अतः जब वह प्रेम चरम सीमा को पहुँच जाता तव प्रेमी तो दु:ख की अनुभूति से परे हो जाता है और उसको सारी वैदना प्रिय के मत्थे जा पड़ती है। समवेदना का यही उत्कर्ष तुल्य प्रेम जीउ काढ़ि लेइ तुम अपई। वह भा कया, जीव तुम भई कया जो लाग धूप नौ सोऊ का न जान जान पं जी भोग तुम्हार मिल श्रोहि जाई। जो मोहि विथा सो तुम्ह कहें आई योगियों के परकायप्रवेश का सा रहस्य समझना चाहिए ग्रस वह जोगी अमर भा, पर काया परवेस प्रेम की प्राप्ति से दृष्टि प्रानंदमयी और निर्मल हो जाती है । जो बातें पहले नहीं सूझती थीं वे सूझने लगती , चारों ओोर सौंदर्य का विकास दिखाई पड़ने लगता है । पद्मावती की प्रशंसा सुनते ही जो प्रेम रत्नसेन के हृदय में संचरित होता है उसके प्रभाव का वर्णन वह इस प्रकार करता सहसौ करा रूप मन भूला जहें जहें दीठ कंवल जन फ्ला तीनि लोक चौदह , सर्ब परै मो ह मूर्ति प्रेम छड़ि नहीं लोन किgजौ देखा मन बूक्षि प्र म का क्षीरसमुद्र अपार औौर अगाध जो इस क्षर समुद्र को पार करते उसकी शुभ्रता के व भाव से जीव' संज्ञा को त्याग शुद्ध ग्रात्मस्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं-‘‘जो एहि खोर समुद्र महें परे । जोव वाइ, हंस होझ तरे।’ फिर तो वे बहुरि न प्राइ मिलहि एहि छारा प्रेम की एक चिनगारी यदि हृदय में पड़ गई और उसे सुलगाते वन पड़ा तो फिर ऐसी अद्भुत अग्नि प्रज्वलित हो सकती है जिससे सारे लोक विचलित हो मुहम चिनगी प्रेम के सुनि महि गगन डेराइ धनि बिरही श्र धनि हिया, जहूँ अस अगिनि समाइ ।