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नामक नाटक लिखा है। आनन्द वर्धनके तथा उसके टीकाकारके ग्रंथोमें इसका उल्लेख पाया जाता है (पिशेल Z. D. M. G. 39. P. 315) आनन्दवर्धनका काल नवीं शताब्दीका उत्तरार्ध समझा जाता है। अतः यह अनुमान किया जा सकता है कि अनङ्ग हर्ष इससे पूर्वमें अवश्य हुआ होगा। इसने रत्नावली का आधार कई जगह पर लिया है। अतः यह स्पष्ट है कि इसका नाटक ७ वीं शतब्दीसे ९ शताब्दीके मध्यसें रचा गया होगा। तापस वत्सराजकी कथा महाकवि भासके स्वप्नवासवदत्ताके समानही है। हाँ, इसके नाटक में कुछ नवीन घटनाओं का उल्लेख अवश्य है संक्षिप्तमें उनका उल्लेख नीचे दिया जाता है। वासवदत्ताकी मृत्युके अनन्तर उदयन तपस्वी हो जाता है। आगे चलकर यौगन्धरायणके उदयनका चित्र देखते ही पद्मावती उसपर अनुरक्त हो जाती है और उसीके प्रेममें तपस्विनी बन जाती है। वासवदत्ता तथा उदयनका संवाद इसमें नहीं दिया हुआ है। इसमें दोनोका साक्षात् प्रयागमें मृत्युके समय होता है और तभी रूमरण्वत के मृत्युका समाचार भी प्राप्त होता है। अनननास——इसका वृक्ष केवड़ेके वृक्षके समान होता है। इसके पत्ते तीन, साढ़े तीन फीट लम्बे तथा दो इञ्च चौड़े होते हैं। इसके पत्ते प्रायः हलके हरे रङ्गके होते हैं। परन्तु कभी कभी रङ्ग-बिरंगे भी दृष्टिगोचर होते हैं। इस पेड़का तना बहुत ही नाटा रहता है। इस वृक्षको रचना ध्यान देने योग्य होती है। जब वृक्ष फल लगने योग्य हो जाती है तब उसमेंसे एक डंडी निकलती है। उस डंडीपर घने फूल लगते हैं। प्रत्येक फूलका स्वतन्त्र फल नहीं होता किन्तु सब फूल मिलकर एक फल होता है। यह वृक्ष उष्ण प्रदेशमें होता है। पहले पहल यह ब्राज़ील देशमें पाया गया था। अमेरिकाका पता लगते ही ये वृक्ष जगत भरमें फैल गये और उष्णकटिबन्धमे उनकी वृद्धी शीघ्र होने लगी। पाइनशङ्कू ( Pine-cone) और इसमें बहुत कुछ साम्य होनेके कारण स्पेनके लोग इसे पिनस (Pinus) कहते थे ब्राज़ीलियन “ननस” नामसे और पुर्तगीज इसे अननस कहने लगे और आधुनिक समयके नाम इसी आधार पर पड़े हैं। हिन्दुस्थानमें इसको, अननस, अनननास, अनारस, अनाशाप, नानट तथा अनस कहते हैं। अननासके बिलकुल आधुनिक नाम फॉरेन्स्कुपाईन् (Foreign serew pine), युरोपियन जैकफूट |
(European jackfruit) हैं। योरप, एशिया, अरब, मिश्रकी पुरानी भाषामें इसका नाम ही नहीं है। यह वृक्ष आधुनिक होने के कारण संस्कृत भाषामें भी इसका नाम नहीं है। इतिहास——ओह्विएडोने (Oviedo) लिखा है कि वेस्टइण्डीज़ द्वीप, और अमेरिका खण्डमें वृक्ष अधिक पाये जाते हैं। क्रिस्टोफर अकोस्टा (Christopher-Acosta) ने १६०५ ई॰ में ही लिख रखा है कि हिन्दुस्थानमें अनननास बहुत पैदा होता है। मार्कग्राफ (Marcgral) और (Hernandez) हरनन्डेज़ने वर्णन किया है कि ब्राज़ील (Haity) हायटी और मेक्सिकोमें अनननास पैदा होता है। १६,१७ तथा १८ वीं शताब्दी के वनस्पति शास्त्रज्ञोंने इसका वर्णन करके चित्र भी निकाले हैं। बोइम (Boym) का कथन है, कि अनननास हिन्दुस्थान ही से चीनमें पहुँचा। अकोस्टाको तरह ह्टडिसका भी कथन है कि पुर्तगीज़ लोगोंने अनननासको हिन्दुस्थानमें लगाया था। वह इतने शीघ्रतासे फैला कि रंफिअस (Rumphius) ने तो समझा कि यह एतद्देशीय ही हैं। लिन्सकोटन (Linshcotan) पिरार्ड (Pyrard), बरनिअर (Bernier) और हरबर्ट (Herbert) इत्यादि मध्यकालीन यात्रियोंने इसका उल्लेख किया है। जहाँगीरने अपने आत्मचरित्रमें ऐसा उल्लेख किया है कि अनननास हिन्दुस्थान में परदेशसे आया, तथापि बाबरके फल की सूची में अनन्नास का नाम नहीं हैं। अनननासकी खेती——ऐसा कहा जाता है कि उष्ण कटिबन्धके अननासोंकी अपेक्षा इंगलैण्डके उष्णगृहमें तैयार किये गये अनननास रुचिकर होते हैं। योरपमें अनननासकी खेती प्रथम लेडेन (Leyden) में १६५० ई॰ में हुई। इंग्लैण्डमें जो अनननास पहले पहल तय्यार हुआ था वह चार्लस द्वितीयको नज़र किया गया (१६७२) था। रेल, जहाज इत्यादि आधुनिक साधनोंसे व्यापार बड़ी शीघ्रतासे होता है, और एक स्थान से दूसरे स्थान पर बड़ी शीघ्रतासे वस्तु पहुँच जाती है, इसलिये वेस्टइण्डीज. मदिरा और कॅनेरी टापूओंमे से जितने चाहे उतने अनननास यूरोप और अमेरिका खण्डमे भेजे जाते हैं। इस कारण इँग्लैण्डके उष्णतागृहमें अनननास तैयार करना बन्द होकर उसका मूल्य कम होगया है। योरप तथा अमेरिकाके उष्ण कटिबन्धों में आजकल लोगोंका ध्यान अनननासकी खेती तथा |
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अनननास
अनननास
ज्ञानकोष (अ)२११