पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१९६

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२०४ देव और विहारी समरथु नीके बहुरूपिया लौ तहाँ ही मै, मोती नथुनी को बर बानो बदलतु है। दास पुकारि कही मैं, दही कोउ लेहु, इतो सुनि अाय गए इत धाय 3 चितै कवि "देव" चिते ही चले, मनमोहन मोहनी तान-सी गाय । न जानाति और कछू तब ते, मन माहिं वहीयै रही छबि छाय; गई तौ हुती दधि-बेंचन-काज, गयो हियरा हरि-हाथ बिकाय । देव जेहि मोहिबे-काज सिँगार सजे, तेहि देखत मोह मै श्राय गई ; न चितौनि चलाय सकी, उनही के चितौनि के घाय अघाय गई। बृषभानलली की दसा सुनौ "दासजू" देत ठगोरी ठगाय गई ; बरसाने गई दधि बेचित्रे को, तहाँ आपुहि आप बिकाय गई। दास (७) फटिक-सिलानि सो सुधाखो सुधा-मदिर, उदधि दाध को सो, अधिकाई उमॅगै अमंद ; बाहर ते भीतर लौ भीति न दिखैयै “देव", दूध कै-सो फेन फैल्यो आँगन फरसबंद । तारा-सी तरुनि तामै ठाढी झिलमिलि होति, मोतिन की जोति मिल्यो मल्लिका को मकरंद ; पारसी-से अंबर मैं आमा-सी उज्यारी लागै, प्यारी राधिका को प्रतिबिंब-सो लगत चंद । आरसी को आँगन सोहायौ, छबि छायो, नहरन मैं भरायो जल, उजल सुमन-माल ;