पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२३१

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तुलना नायिका डर गई है । वह उनके इस भ्रम को दूर करना चाहती है कि मैं कमलिनी हूँ। उधर सूखे वस्त्रों के लिये उसे सरोवर-तट पर खड़ी सखी को भी सचेत करना है । बस, वह दो-एक वचन कहकर भ्रमरों का भ्रम मिटाती और सखी को सचेत करती है तथा कवि को अपने पिकवैनी होने का परिचय देती है। अब वह पानी से निकलनेवाली है, कटि के नीचे का वस्त्र जलाई होने के कारण भारी हो गया है। अतः वह स्वाभाविक रीति से नीचे को खिसक रहा है। इसी को संभालने के लिये नायिका को.. नींबी (कटि-बंधन ) उकसानी पड़ी है और नींबी उकसाने में हाथों के अटक जाने के कारण ही श्रीफल-उरोजों की गौर भाभा, जिन पर पीत सारी चिपकी हुई है, अधिक-अधिक आभासित हो रही है। इस प्रकार नींबी-रक्षा करते हुए उसे सुरति-समय का स्मरण हो पाया है, जिससे उसके नेत्रों में छिपी हुई ईषत् हँसी श्राभासित हो गई है। स्वाभाविक जल-केलि-जन्य अानंद से उसकी हँसी स्पष्ट भी है। नींबी उकसाने में उसे जो स्मृति आ गई है, उसे वह प्रकट नहीं होने देना चाहती एवं हाथों के, नींबी उकसाने के कार्य में, लग जाने के कारण उरोजों का गोपन नहीं हो सका है। अतएव नायिका को संकोच भी हो रहा है। पीत रंग सारी गोरे अंग मिलि गई। में मीलित, इस मेल के कारण 'श्रीफल-उरोज-अामा श्राभास अधिक में अनुगुन, "बिना बंदी-बंदन बदन-सोभा बिकसी' में विनोक्ति, 'तजि-तजि कुंज-पुंज ऊपर मधुप-पुंज गुंजरत' में भ्रांति-मान, 'बोलै बाल पिक-सी' में लुप्तोपमा, कुल छंद में स्वभावोक्कि, 'आमा भाभास' में यमक, 'तजि-तजि' में वीप्सा एवं स्थल-स्थल पर, छंद में, अनुप्रास का चमत्कार है । शरत्कालीन जल-केलि का दृश्य और हाव का रूप है। पद्मिनी नायिका श्रृंगार रस की सर्वस्व हो रही है। प्रसाद, माधुर्य आदि गुणों से युक्त लाक्ष-