पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/४१

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देव और बिहारी
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(४) कौन सुनै ? कासों कहौं ? सुरति बिसारी नाह; बदा-बदी जिय लेत हैं ये बदरा बदराह ? विहारी (५) दूरि जदुराई, “सेनापति" सुखदाई देखो, ___आई ऋतु-पावस, न पाई प्रेम पतियाँ : धीर जलधर की सुनत धुनि धरकी, मु-दरकी सुहागिन की छोह-भरी बतियाँ । आई सुवि बर की, हिये मे श्रानि खरकी सुमिरि प्रानप्यारी वह प्रीतम की बतियाँ बीती औधि श्रावन की लाल मन-भावन की, डग भई बावन को सावन की रतियाँ । सेनापति (६) इभ-से भिरत चहुँघाई से घिरत घन, आवत भिरत झीने भर सों झपकि-झपकि सोरन मचावै, नमोरन की पॉति, चहूँ ___ोरनते कौंधि जाति चपला लपकि-लपाक । बिन प्रान-प्यारे प्रान न्यारे होत “देव" कहै, नैन-बरुनीन रहे अँसुत्रा टपकि-टपकि; रतिया अंधेरी, धीर न तिया धरति, मुख बतियाँ कढ़ति उठ छतियाँ तपकि-तपकि । [ ] विरह की अधिकता में तजन्य ताप से जो उत्पात होते हैं, उनके एवं अश्रुपात-अधिकता-संबंधी वर्णन भी बड़े ही सुहावने ढंग से किए गए हैं। कहना न होगा कि दोनों ही प्रकार के वर्णन अतिशयोक्तिमय हैं। कुछ उदाहरण तुलना के लिये पर्याप्त होंगे-