पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/६२

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भूमिका धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहसांश्च सर्वशः। चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥ ५८ ॥* इस प्रकार पक्षिशास्त्रवेत्ताओं के मतानुसार चक्रवाक और हंस चचेरे भाई हैं और महाभारत के अनुसार सगे भाई । प्रत्यक्ष में देखने से उनके रूप, आकृति और स्वभाव भी यही सूचित करते हैं। ऐसी दशा में हंसों और चक्रवाकों के समान-जातीय होने की ही अधिक संभावना समझ पड़ती है। दोनों पक्षियों के समान-जातीय होने की बात पर विचार कर चुकने के बाद इस प्रश्न का उत्तर रह जाता है कि क्या चक्रवाक वर्षा के अवसर पर भारतवर्ष में पाए जाते हैं ? सौभाग्य से प्रावृट्- काल भारत में प्रतिवर्ष उपस्थित होता है। अपने नेत्रों की सहा- यता से यदि हम चक्रवाकों को इस समय आकाश में विचरते अथवा जल-परिपूर्ण जलाशयों में कलोल करते देखें, तो माननाही होगा कि वर्षा-काल में चक्रवाक भारत में अवश्य पाए जाते हैं। पर यदि यथेष्ट उद्योग करने पर भी हमें उनके दर्शन दुर्लभ ही रहें, तो इसके विपरीत निर्णय को मानने में भी हमें किसी प्रकार का संकोच न होना चाहिए । प्रकृति-निरीक्षण के मामले में तो प्रत्यक्ष प्रमाण ही सर्वोपरि है। इस संबंध में हमने अपने नेत्रों की सहा- यता ली, अपने मित्रों के नेत्रों की सहायता ली, चक्रवाक का मांस खाने को लालायित, बंदूक बाँधे शिकारियों के नेत्रों की सहायता बी और पक्षियों का व्यापार करनेवाले चिड़ीमारों के नेत्रों की सहा- यता ली। इस संयुक्त सहायता से हमें तो यही अनुभव प्राप्त हुभा कि वर्षा-काल में, भारतवर्ष में, चक्रवाक नहीं पाए जाते। अपने समान-जातीय हंसों के साथ ही इस समय वे भारत के उत्तर में

  • वाल्मीकीय रामायण के आरण्य-कांड में भी यह श्लोक, इसी रूप में,

कुछ साधारण शाब्दिक परिवर्तन के साथ है।