पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/९३

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भाव-सादृश्य के पद्मिनी-गुण को स्पष्ट करने के फेर में उसने अभिसारिका का परम अहित किया है । भौंरों को ऊपर मँडराते देखकर विचक्षण बुद्धि- वाले अवश्य मामला समझ जायँगे---इस प्रकार वलया का बाँधना और बजनी का विगत करना व्यर्थ हो गया । पूर्ववर्ती कवि ने नायिका के शरीर में चंदन और धनसार का लेप करवाकर पद्म- गंधि को कुछ समय के लिये दबा दिया है। कर्पूर की बास के सामने अन्य सुगंधि लुप्त हो जाती है, फिर पद्म-गंधि को दबा लेना कौन-सी बात है। आनन-प्रभा की अपेक्षा मुख-चंद से छाँह का छिपना भी विशेष रमणीय है। कहने का तात्पर्य यह कि पूर्ववर्ती कवि का भाव लेकर उसे वैसा ही बना रहने देना तो दूर, परवर्ती कवि ने उसे अपनी काट-छाँट से पहले-जैसा भी नहीं रहने दिया । वे उसे अपना नहीं सके । अशर्फियों की ढेरी पर कोयले की छाप बैठ गई । भाव अपनाने में जहाँ परवर्ती कवि इस प्रकार की असमर्थता दिखलावे, वहीं पर वह चोरी के अभियोग में गिरफ्तार हो जायगा । दूसरे के जिस माल का वह यथार्थ उप- योग करना नहीं जानता, उस पर हाथ फेरने का उसे कोई अधिकार नहीं। सारांश-भाव-सादृश्य को हम तीन भागों में बाँटते हैं- (१) सौंदर्य-सुधार, (२) सौंदर्य-रक्षा, (३) सोंदर्य-संहार । प्रथम दो को साहित्य-नर्मज्ञ अच्छा मानते हैं । सौंदर्य-सुधार की तो भूरि- भूरि प्रशंसा की जाती है। हाँ, सौंदर्य-संहार को ही दूसरे शब्दों में साहि- त्यिक चोरी कहते हैं, इसलिये अगर कहीं भाव-सादृश्य देखा जाय, तो परवर्ती कवि को फ़ोरन् चोर नहीं कह देना चाहिए। यह देख लेना चाहिए कि उसने पूर्ववर्ती कवि के भाव को बिगाड़ा है या सुधारा? यदि भाव का बिगड़ना साबित हो जाय, तो परवर्ती कवि अवश्य चोर है।