पृष्ठ:नव-निधि.djvu/१०८

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ममता


सेठ-यह आप कैसी बातें कहते हैं ?

रामरक्षा-बहुत सच्ची।

सेठ-दूकानें नहीं हैं ?

रामरक्षा-दुकाने आप मुफ्त ले जाइए।

सेठ-बैंक के हिस्से ?

रामरक्षा-वह करके उड़ गये।

सेठ-जब यह हाल था, तो आपको उचित नहीं था कि मेरे गले पर कुरी फेरते ?

रामरक्षा-(अभिमान से ) मैं आपके यहाँ उपदेश सुनने के लिए नहीं आया हूँ।

यह कहकर मिस्टर रामरक्षा वहाँ से चल दिये। सेठजी ने तुरन्त नालिश कर दी। बीस हजार मूल, पाँच हजार व्याज। डिगरी हो गई। मकान नीलाम पर चढ़ा। पन्द्रह हजार की जायदाद पाँच हजार में निकल गई। दस हजार की मोटर चार हजार में बिकी। सारी सम्पत्ति उड जाने पर कुल मिलाकर सोलह हजार से अधिक रकम न खड़ी हो सकी। सारी गृहस्थी नष्ट हो गई, तब भी दस हजार के ऋणी रह गये। मान-बड़ाई, धन-दौलत, सब मिट्टी में मिल गये। बहुत तेज दौड़नेवाला मनुष्य प्रायः मुँह के बल गिर पड़ता है।

इस घटना के कुछ दिनों पश्चात् दिल्ली म्युनिसिपैलिटी के मेम्बरों का चुनाव प्रारम्भ हुआ। इस पद के अभिलाषी वोटरों की पूजाएँ करने लगे। दलालों के भाग्य उदय हुए। सम्मतियाँ मोतियों के तौल बिकने लगी। उम्मेदवार मेम्बरों के सहायक अपने-अपने मुवक्किल के गुणगान करने लगे। चारों ओर चहल-पहल मच गई। एक वकील महाशय ने भरी सभा में अपने मुवक्किल साहब के विषय में कहा-

'मैं जिस बुजुरुग का पैरोकार हूँ वह कोई मामूली आदमी नहीं है। यह वह शख्स है जिसने अपने फ़रजन्द अकबर की शादी में पचीस हजार रुपया सिर्फ रक्स व सरूर में सर्फ कर दिया था।'