पृष्ठ:नव-निधि.djvu/७०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
६३
पाप का अग्निकुण्ड


धर्मसिंह -- राजपूत, अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।

इतना सुनते ही पृथ्वीसिंह ने बिजली की तरह कमर से टेगा खींच लिया और उसे धर्मसिंह के सीने में चुभा दिया। मूठ तक तेगा चुभ गया। खून का फव्वारा बह निकला। धर्मसिंह ज़मीन पर गिरकर धीरे से बोले -- पृथ्वीसिंह, मैं तुम्हारा बहुत कृतज्ञ हूँ। तुम सच्चे वीर हो। तुमने पुरुष का कर्तव्य पुरुष की भाँति पालन किया।

पृथ्वीसिंह यह सुनकर ज़मीन पर बैठ गये और रोने लगे।

अब राजनन्दिनी सती होने जा रही है। उसने सोलहों श्रृंगार किये हैं और माँग मोतियों से भरवाई है। कलाई में सोहाग का कंगन है पैरों में मावर लगाया है और लाल चुनरी ओढ़ी है। उसके अंग से सुगन्धि उड़ रही है, क्योंकि वह श्राज सती होने जाती है।

राजनन्दिनी का चेहरा सूर्य की भाँति प्रकाशमान है। उसकी ओर देखने से आँखों में चकाचौंध लग जाती है। प्रेम-मद से उसका रोयां-रोयां मस्त हो गया है, उसकी आँखों से अलौकिक प्रकाश निकल रहा है। वह आज स्वर्ग की देवी जान पड़ती है। उसकी चाल बड़ी मदमाती है। वह अपने प्यारे पति का सिर अपनी गोद में लेती है, और उस चिता में बैठ जाती है जो चन्दन, खस आदि से बनाई गई है।

सारे नगर के लोग यह दृश्य देखने के लिए उमड़े चले आते हैं। बाजे बज रहे हैं, फूलों की वृष्टि हो रही है। सती चिता में बैठ चुकी थी कि इतने में कुँवर पृथ्वीसिंह आये और हाथ जोड़कर बोले -- महारानी, मेरा अपराध क्षमा करो।

सती ने उत्तर दिया -- क्षमा नहीं हो सकता। तुमने एक नौजवान राजपूत की जान ली है, तुम भी जवानी में मारे जाओगे।

सती के वचन कभी झूठे हुए हैं ? एकाएक चिता में आग लग गई। जय-जयकार के शब्द गूँजने लगे। सती का मुख भाग में यों चमकता था; जैसे सबेरे की ललाई में सूर्य चमकता है। थोड़ी देर में वहाँ राख के ढेर के सिवा और कुछ न रहा।

इस सती के मन में कैसा सत था! परसों जब उसने व्रजविलासिनी को