पृष्ठ:निर्मला.djvu/११०

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१०७ श्राठवां परिच्छेद

सहसा मर्दाने कमरे में मुन्शी जी के खाँसने की आवाज़ आई। ऐसा मालूम हुआ कि वह मन्साराम के कमरे की ओर आ रहे हैं। निर्मला के चेहरे का रङ्ग उड़ गया। वह तुरन्त कमरे से निकलगई;और भीतर जाने का मौका न पाकर कठोर स्वर में बोली-मैं लौंडी नहीं हूँ कि इतनी रात तक किसी के लिए रसोई के द्वार पर बैठी रहूँ। जिसे न खाना हो, वह पहले ही कह दिया करे। .

मुन्शी जी ने निर्मला को वहाँ खड़े देखा। यह अनर्थ!! यह यहाँ क्या करने आ गई? बोले-यहाँ क्या कर रही हो?

निर्मला ने कर्कश स्वर में कहा कर क्या रही हूँ, अपने भाग्य को रो रही हूँ। बस,सारी बुराइयों की जड़ मैं ही हूँ। कोई इधर रूठा बैठा है,कोई उधर मुंह फुलाए पड़ा है। किस-किस को मनाऊँ और कहाँ तक मनाऊँ?

मुन्शी जी कुछ चकित होकर बोले-बात क्या है?

निर्मला-भोजन करने नहीं जाते;और क्या बात है? दस दने महरी को भेजा। आखिर आप दौड़ी आई। इन्हें तो इतना कह देना आसान है,मुझे भूख नहीं है;यहाँ तो घर भर की लौंडी हूँ, सारी दुनिया मुँह में कालिख लगाने को तैयार। किसी को भूख न हो; पर कहने वालों को यह कहने से कौन रोकेगा कि यह पिशाचिनी किसी को खाना नहीं देती। मुन्शी जी ने मन्साराम से कहा-खाना क्यों नहीं खा लेते जी? जानते हो क्या वक्त है?

मन्साराम स्तम्भित सा खड़ा था। उसके सामने एक ऐसा रहस्य हो रहा था,जिसका मर्म वह कुछ भी न समझ सकता था।