सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:परमार्थ-सोपान.pdf/२२८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१७०
[ Part I Ch. 5
परमार्थसोपान


12. MAHIPATI ON A MYSTIC'S LIFE IN A TUMULT
OF LIGHT AND COLOUR.



साई अलख पलख में झलके, लहलहाट बिजली चमके ॥
मन गर‍‌क हुआ, मन गरक,
गुरु साईंनाथ आज पाया, मुझ पकड़ दस्त बैठाया,
दो अच्छर बीज पढ़ाया, मेरे सिर पर हाथ चढ़ाया ॥
अब तू सच्चा गुरु का बच्चा, देख परीच्छा,
छइ बदन जुगुत से जखड़,
मत डर जोर से पकड़,
जो आवे उसे दे छकड़,
आगे पीछे मोर की पाँखें, लहलहाट बिजली चमके ॥ १ ॥

नीचे धरनि ऊपर असमाना, दोऊ छोड़ बीच में जाना,
चल सरक, आगे चल सरक
प्यारे उलट पुलट से चलना, साहब से जुगुत से मिलना
भ्रुकुटी ऊपर, त्रिकुटी शीखर, ध्यान लगाकर,
खूब देख नजर से अभी,
रज सोना बिखरा सभी,
मूल माया की जो छबी,
छोड़ माया स्वरूप परखे, लहलहाट बिजली चमके ॥ २ ॥

(Contd. on p. 172)