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पृष्ठ:परमार्थ-सोपान.pdf/२६६

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२०८
[ Part I Ch. 5
परमार्थसोपान


30. "I AM NOW A BONDSMAN OF MY LORD ;
SAYS NARAHARINATH, "WHAT CARE I
FOR THE WORLD? "



क्या बे किसी से काम, हम तो गुलाम गुरु घर के ।
बेपरवा मन मौजी राजा, हम अपने दिल के ॥ १ ॥

नहीं किसी से दरकार, टुकड़ा मँगकर खाते हैं ।
गुरु ज्ञान के अमल नशे में, हमेश झुलते हैं ॥ २ ॥

गगन मण्डल में दस नादों का, अवाज सुनते हैं ।
तीनों ऊपर धुनी लगाकर, बैठे रहते हैं ॥ ३ ॥

चाँद सूरज मशाल लेकर, आगे चलते हैं ।
अर्धचन्द्र का अमृत प्याला, भर भर पीते हैं ॥ ४ ॥

उल्टी तुरिया होगइ उन्मनि, मिल गई जाकर के |
पलख में रहना अलख जगाना, कलख जलाकर के ॥ ५ ॥

हुआ दिवाना फकीर भोला, भटकत फिरता है ।
झूटी माया प्रीति लगाकर, गोते खाता है ॥ ६ ॥

नाहीं रहना काम करो कुछ डेरा गिरता है ।
नरहरि मौला जल्दी आकर, हुशार करता है ॥ ७ ॥