मन अधीर रहता है, कब रात आएगी, कब मैं बिस्तर पर लेट सकूँगा। जतीन को आँखो के सामने लाते ही वो तन जाता है। तकिये पर उसे रगडता हूँ। रगडते रगडते उसमें से सफेद पानी आता है। जतीन को मन में रखकर ऐसे करना मुझे अच्छा लगने लगा है। छोटा-सा ही सही, लेकिन मेरा अपना अलग कमरा है, यह मेरी खुशकिस्मती थी। हर रात करना चाहता तो हूँ, मगर दूसरी तरफ शरम भी लगती है। मेरी ऐसी हरकतों का किसी को पता चलेगा तो वे क्या कहेंगे। माँ, जतीन को कितना दुःख होगा। वह कितना शरीफ है। मेरे जैसा गया-गुजरा नहीं। उस वक्त मुझे पता नहीं था की मेरी यह इच्छा प्राकृतिक, स्वाभाविक है, उसमें अनुचित कुछ भी नहीं है। अब नहाते वक्त बाथरूम में भी मैं हाथ से करने लगा हूँ। हर रोज नहाने की आदत इसी कारण पड़ गई है। आज पिताजी चिल्लाए। वैसे शोर गुल मचाने के लिए उन्हें किसी खास कारण की जरूरत नहीं होती। 'मुझे ऑफिस जाने की जल्दी है, और ये घंटों बाथरूम में क्या कर रहा है? नहाने में इतना समय?' कल से मैं उन्हें पहले नहाने का चान्स दे दूंगा। मुझे ऐसी जल्दबाजी मंजुर नहीं। माँ को भी आजकल एक बुरी आदत लगी है। हर सुबह चिल्लाती है, 'रोहित, पैजामा, जाँघिया धोने के लिए रख दो।' उसका इस तरह से बोलना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। पर उससे शिकायत करना बेकार है, मानेगी नहीं। हर शनिवार हनुमान जी के मंदिर में जाने लगा हूँ। हार, तेल अर्पन करता हूँ। प्रार्थना करता हूँ, हनुमान जी, इस गंदी आदत से मुझे बचा लो क्षमा माँगता हूँ। यह मेरे अकेले का पाप है, इसमें जतीन का तनीक भी दोष नहीं। उसे सजा मत देना। दोनों की सजा मैं भुगलूँगा। स्कूल में छुट्टि पड़ गई है। क्रिकेट खेलते वक्त, सोसायटी के लड़के, मुझे हमेशा लास्ट में चुनते है। क्योंकि मैं हमेशा पहलीही गेंद पर आऊट हो जाता हूँ। मुझे बॉलिंग भी नहीं आती। सिर्फ फिल्डिंग करनी पड़ती है। बोअर हो जाता हूँ। आज मेरे हाथों कॅच छूट गया। वैसे वो गेंद मेरी तरफ आ रही थी, इस बात का मुझे पता ही नहीं चला। मैं खड़े खड़े जतीन का सपना देख रहा था। पूरी टीम मुझपर बरस पड़ी।
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