पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१३६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।


(१२४ )


मान समय के अच्छे बुरे लोगों का अन्य लोगों को स्मरण होता है। अतः औरों की अपेक्षा इन में से नर्कगामी थोड़े होने चाहिये। हां, जोतषियों में बहुत लोग ऐसे हैं जो पढ़े लिखे राम का नाम ही हैं, पर सबके अदृष्ट बतलाने तथा अनमिल जोड़ी मिलाने और वर कन्या का जन्म नशाने एवं बैठे बिठाये गृहस्थों को जी में शंका उपजाने का बीड़ा उठाये बैठे हैं। वे अवश्य नर्क भागी हों। पर जो अपनी विद्या के बल से भूगोल खगोल को हस्ता-मलक किये बैठे हैं उन्हें कौन नर्क भेज सकता है ? अथवा यह कह देते हैं कि अमुक ग्रंथ के अनुसार हमारे विचार यों आता है आगे क्या होगा क्या नहीं यह प्रश्न ईश्वर से जाके करो, वह कहने वाले नर्क से दूर हैं।

रहे हरनिन्दक । उन्हें नर्क से कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि परमेश्वर सदा एकरस, आनन्दमय है। उनकी निन्दा से न उसको हानि है, न जगत की हानि है। हां, निन्दक अपना पागलपन दिखाता है । सो पागलपन एक रोग है, पाप नहीं। यदि हरनिन्दक का अर्थ 'अनीश्वरवादी' लीजिये, तो भी नर्क को उससे क्या सम्बन्ध है ? एक बात उसकी समझ में नहीं आती, उसे वह नहीं मानता। बस ! बरंच हम देखते हैं तो सबकी स्वत्वरक्षा सब से न्यायाचरण आदि गुण बहुधा नास्तिकों ही में पाये जाते हैं। कपटी उनमें बहुत कम हैं। भला ऐसे लोग नर्क जायंगे ? हो, हरि की वास्तविक निन्दा किसी मत के कट्टर पक्षपाती अवश्य करते हैं। उनका नर्क-बास युक्ति-