पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/२२८

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(२१७ )

चारि वेद कर सार यह सुनि राखहु सब कोय ।
'ढाई अच्छर प्रेम के पढ़ै सो पण्डित होय' ॥
व्यापक ब्रह्म सदा सब ठौर, बादि चारि धामन की दौर ।
कस न देखु मन नयन उघारि, 'कनियाँ लरिका गाँव गुहारि ॥
प्रभु करुनाकर शांति निकेत, तिहि तजि पूजत भूत परेत ।
कस सुख पावै असि मति जासु, 'दही के धोखे खाय कपासु' ।।
पढ़ि कमाय कीन्हों कहा हरे न देश कलेश ।
'जैसे कन्ता घर रहे तैसे रहे विदेश' ।।
काम निकासिय साम दाम भय भेद ते ।
सब सँग इक से रहत लहत नर खेद ते ॥
पर रुख लखि चलिवो चतुरन की बात है ।
'आंधर बैल भँवाय के जोता जात है'॥
भाय २ आपस में लरैं, परदेसिन के पायन परैं ।
दहै द्वेष भारत शशि राहु,'घर का भेदिया लंका दाहु' ।।
अपनो काम आपने ही हाथन भल होई ।
परदेशिन परधर्मिन ते आशा नहिं कोई ॥
धन धरती निज हरी सु करिहैं कौन भलाई ।
'जोगी काके मीत कलंदर केहि के भाई ॥
जिन आरम्भ शूरता कीन्हीं, विघन परत हिम्मति तजि दीन्हीं।
बिरथा श्रम कर अपजस लहिगे,'निंबुआ नोन चाटिकै रहिगे'।।
श्रमी साहसी दृढ़ बरियार, ताहि सहज जग पर अधिकार ।
झूठ न कहैं बात जग ऐसी, "जिहि कै लाठी तिहि कै भैंसी' ।।