पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/५४

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संतुष्ट होंगे न आपही के शब्दशास्त्र ज्ञान का परिचय होगा, इससे अच्छे प्रकार कहिए कि जैसे 'मैं' का शब्द अपनी नम्रता दिखलाने के लिए बिल्ली की बोली का अनुकरण है, 'तू' का शब्द मध्यम पुरुष की तुच्छता व प्रीति सूचित करने के अर्थ कुत्ते के सम्बोधन की नक़ल है । हम तुम संस्कृत के अहं त्वं का अपभ्रंश हैं, यह वह निकट और दूर की वस्तु वा व्यक्ति के द्योतनार्थ स्वाभाविक उच्चारण हैं, वैसे 'आप' क्या है ? किस भाषा के किस शब्द का शुद्ध वा अशुद्ध रूप है, और आदर ही में बहुधा क्यों प्रयुक्त होता है ?

हुजूर की मुलाज़मत से अक्ल ने इस्तेअफ़ा दे दिया हो तो दूसरी बात है, नहीं तो आप यह कभी न कह सकेंगे कि “आप लफ़जे फ़ारसी या अरबीस्त," अथवा "ओः इटिज़ एन इंगलिश वर्ड," जब यह नहीं है तो खाहमखाह यह हिंदी शब्द है, पर कुछ सिर पैर मूड़ गोड़ भी है कि योंहीं ? आप छूटते ही सोच सकते हैं कि संस्कृत में आप कहते हैं जल को, और शास्त्रों में लिखा है कि विधाता ने सृष्टि के आदि में उसी को बनाया था, यथा-'अप-एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत,' तथा हिन्दी में पानी और फारसी में आब का अर्थ शोभा अथच प्रतिष्ठा आदि हुवा करता है, जैसे “पानी उतरि गा तरवारिन को उइ करछुलि के मोल विकायं", तथा “पानी उतरिगा रजपूती का उइ फिर विसुऔते (वेश्या से भी) बहि जांय,” और फारसी में 'आबरू खाक में मिला बैठे' इत्यादि।