पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/७२

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अपने मतलब की कह रहा है, पर लच्छेदार बातों के मायाजाल में फँस बहुधा सभी जाते हैं। क्यों नहीं ? एक लेखे पूछो तो खुशामदी भी एक प्रकार के ऋषि मुनि होते हैं। अभी हम से कोई जरा सा नखरा करे तो हम उरद के आटे की भांति ऐंठ जांय। हमारे एक उजड्ड साथी का कथन ही है कि 'वरं हला-हल पानं सद्यः प्राण हरं विषं! नहिं दुष्ट धनाढ्यस्य भ्रू भृगं कुटिला ननः।' पर हमारे खुशामदाचार्य महानुभाव सब तरह की झिड़की, निन्दा, कुबातें सहने पर भी हाथ ही जोड़ते रहते हैं। भला ऐसे मन के जीतनेवालों के मनोरथ क्यों न फलें। यद्यपि एक न एक रीति से सभी सब की खुशामद करते हैं, यहां तक कि जिन्होंने सब तज हर भज का सहारा करके बनवास अंगीकार किया है, कंद मूल से पेट भरते हैं, भोज पत्रादि से काया ढकते हैं, उन्हें भी गृहस्थाश्रम की प्रशंसा करनी पड़ती है। फिर साधारण लोग किस मुँह से कह सकते हैं कि हम खुशामद नहीं करते। बरंच यह कहना कि हमें खुशामद करनी नहीं आती यह आलादरजे की खुशामद है। जब आप अपने चेले को, नौकर को, पुत्र को, स्त्री को, खुशा- मदी को नाराज़ देखते हैं और उसे राजी न रखने में धन, मान, सुख, प्रतिष्ठादि की हानि देखते हैं तब कहते हैं क्यों? अभी सिर से भूत उतरा है कि नहीं? यह भी उलटे शब्दों में खुशामद है। सारांश यह कि खुशामद से खाली कोई नहीं है। पर खुशामद करने की तमीज़ हर एक को नहीं आती। इतने बड़े हिन्दुस्तान