श्रीकंठ—तो मैं क्या करूँ?
आनंदी—भीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे! मैंने कहाँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ—मैं न बुलाऊँगा।
आनंदी—पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गई है, ऐसा न हो कहीं चल दें।
श्रीकंठ न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा—भाभी भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए मैं भी अपना मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।
लाल बिहारी इतना कहकर लौट पड़ा, और शीघ्रता से दरवाज़े की ओर बढ़ा। अन्त में आनंदी कमरे से निकली, और उसका हाथ पकड़ लिया। लाल बिहारी ने पीछे फिरकर देखा, और आँखों में आँसू भरे बोला—मुझे जाने दो।
आनंदी–कहां जाते हो?
लाल बिहारी–जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे।
आनंदी—मैं न जाने दूँगी।
लालबिहारी—मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आनंदी—तुम्हें मेरी सौगंद, अब एक पग भी आगे न बढ़ना।
लालबिहारी—जब तक मुझे यह न मालूम हो जाय, कि भैया का मन मेरी तरफ़ से साफ़ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।
आनंदी—मैं ईश्वर की साक्षी देकर कहती हूँ, कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूटकर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा—भैया, अब कभी मत कहना, कि तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दण्ड देंगे, वह मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।