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प्रेम-पंचमी

याद न आती। वह अपनी दशा पर संतुष्ट था। केवल ज्ञान- प्रकाश की प्रेम-युक्त बातें न भूलतीं। अंधकार में यही एक प्रकाश था। बिदाई का अंतिम दृश्य आँखों के सामने फिर करता। जीविका से निश्चित होकर उसने ज्ञानप्रकाश को एक पत्र लिखा। उत्तर आया। उसक आनंद की सीमा न रही। ज्ञानू मुझे याद करके रोता है, मेरे पास आना चाहता है, स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है। प्यासे को पानी से जो तृप्ति होती है, वही तृप्ति इस पत्र से सत्यप्रकाश को हुई। मैं अकेला नहीं हूँ, कोई मुझे भी चाहता है―मुझे भी याद करता है!

उस दिन से सत्यप्रकाश को यह चिंता हुई कि ज्ञानू के लिये कोई उपहार भेजूँँ। युवकों को मित्र बहुत जल्द मिल जाते हैं। सत्यप्रकाश की भी कई युवकों से मित्रता हो गई थी। उनके साथ कई बार सिनेमा देखने गया। कई बार बूटी-भंग, शराब-क़वाब की भी ठहरी। आइना, तेल, कंघी का शौक़ भी पैदा हुआ। जो कुछ पाता, उड़ा देता; बड़े वेग से नैतिक पतन और शारीरिक विनाश की ओर दौड़ा चला जाता था। इस प्रेम-पत्र ने उसके पैर पकड़ लिए। उपहार के प्रयास ने इन दुव्यसनों को तिरोहित करना शुरू किया। सिनेमा का चसका छूटा। मित्रों को हीले-हवाले करके टालने लगा। भोजन भी रूखा-सूखा करने लगा। धन-संचय की चिंता ने सारी इच्छाओं को परास्त कर दिया। उसने निश्चय किया कि एक अच्छी-सी घड़ी भेजूँँ। उसका दाम कम-से-कम ४०) होगा। अगर तीन महीने