ऊ-संस्कृत या हिंदी वर्णमाला का छठा अक्षर या व जिसका उच्चारण- स्थान ओष्ठ है। कुंग-संज्ञा स्त्री० दे० "ऊँ”। कुंगा-संज्ञा पुं० चिचड़ा । ऊँघ -संज्ञा स्त्री० उँचाई । घन-संज्ञा स्त्री० ऊँघ । झपकी । ऊँघना- क्रि० प्र० झपकी लेना । ऊच + - वि० दे० " ऊँचा " । ऊँचा - वि० [स्त्री० ॐची] जो दूर तक ऊपर की ओर गया हो । उचत । ऊँचाई - -संज्ञा खी० १. ऊपर की ओर का विस्तार | बलंदी | २. गौरव । ऊँचे- क्रि० वि० १. ऊपर की ओर । २. जोर से । ऊँछना - क्रि० म० कंघी करना । ऊँट - संज्ञा पुं० [स्त्री० ऊँटनी] एक ऊँचा पाया जो सवारी और बोझ लादने के काम में आता है । कुँटवान -संज्ञा पुं० ऊँट चलानेवाला । ऊँड़ा + - संज्ञा पुं० १. वह बरतन जिसमें धन रखकर भूमि में गाड़ द । २. सहखाना । वि० गहरा । गंभीर । ऊँदर | -संज्ञा पुं० चूहा । ऊँहूँ -श्रव्य ० नहीं । छ - संज्ञा पुं० १. महादेव । २. चंद्रमा ।
- अव्य० भी ।
- + सर्व ० वह ।
कचाबाई - वि० अंडबंड । ठक - संज्ञा पुं० १. टूटता हुआ सारा । २. जलन | ११८ ऊ ऊदबिलाव संज्ञा स्त्री० भूल । चूक । ऊकना- क्रि० प्र० १. चूकना । २. भूख करना । क्रि० स० भूल जाना । क्रि० स० जलाना । - ऊख - संज्ञा पुं० ईख । गन्ना । ऊखल - संज्ञा पुं० प्रोखली । ऊगना- क्रि० प्र० दे० " उगना" । ऊज - संज्ञा पुं० उपद्रव । ऊधम । ऊजड़- वि० दे० "उजाड़" । ऊजर - वि० दे० " उजला " । वि० उजाड़ । ऊजरा - वि० दे० " उजला " । ऊटक नाटक-संज्ञा पुं० व्यर्थ का काम | ऊटना- क्रि० प्र० १. उत्साहित होना। २. तर्क-वितर्क करना । ऊटपटांग - वि० १. अटपट । २. व्यर्थ । ऊड़ना - क्रि० स० दे० " ऊढ़ना" । ऊढ़ - वि० [स्त्री० ऊढ़ा ] विवाहित । ऊढ़ना - क्रि० भ० तर्क करना । क्रि० प्र० विवाह करना । ब्याहना । ऊढ़ा - संज्ञा स्त्री० विवाहिता स्त्री । ऊत - वि० १. निःसंतान । २. उजड्ड । ऊतिमा - वि० दे० " उत्तम" । ऊद-संज्ञा पुं० अगर का पेड़ या लकड़ी । संज्ञा पुं० ऊदबिलाव । ऊदबत्ती - संज्ञा स्त्री० अगर की बची जिसे सुगंध के लिये जलाते हैं 1 ऊदबिलाव - संज्ञा पुं० नेवले आकार का, पर उससे बड़ा, एक जंतु जो जल और स्थल दोनों में रहता है ।