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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/१३८

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कंपित कंपित - वि० काँपता हुआ । कंपू - संज्ञा पुं० छावनी । कंबल - संज्ञा पुं० [स्रो० अल्पा० कमली ] ऊन का बना हुआ मोटा कपड़ा । कंबु, कंबुक - संज्ञा पुं० १. शंख । २. घोंघा । ३ हाथी । कँवल - संज्ञा पुं० दे० " कमल" । कँवलगट्टा - संज्ञा पुं० कमल का बीज । फंस - संज्ञा पुं० १. कसा । २. प्याला । ३. मथुरा के राजा उग्रसेन का लड़का जो श्रीकृष्ण का मामा था और जिसको श्रीकृष्ण ने मारा था । कई - वि० अनेक | ककड़ी -संज्ञा स्त्री० ज़मीन पर फैलने- वाली एक बेल जिसमें लंबे लंबे फल लगते हैं । ककहरा - संज्ञा पुं० 'क' से 'ह' तक वर्णमाला | ककुभ - संज्ञा पुं० १. एक राग । २. एक छंद । कक्का - संज्ञा पुं० दे० "काका" । कक्ष -संज्ञा पुं० १. कख । २. लाँग । ३. कछार । ४. कखरवार । ५. दर्जा । कक्षा - संज्ञा स्त्री० १. परिधि । २. ग्रह के भ्रमण करने का मार्ग । ३. श्रेणी । कखौरी | -संज्ञा स्त्री० काँख का फोड़ा । कगर -संज्ञा पुं० कुछ ऊँचा किनारा | क्रि० वि० किनारे पर । कगार - संज्ञा पुं० १. ऊँचा किनारा । २. नदी का करारा । कच - संज्ञा पुं० १. बाल । २. सूखा फोड़ा या ज़ख़्म | संज्ञा पुं० धँसने या चुभने का शब्द । १३० कचूमर कचक | - संज्ञा स्त्री० कुचल जाने की चोट । कचकत्र - संज्ञा स्त्री० बकवाद | झकझक | कचकचाना- क्रि० प्र० १. कचकच शब्द करना । २. दांत पीसना । कचदिला - वि० कच्चे दिल का । कचनार - संज्ञा पुं० एक छोटा पेड़ जिसमें सुंदर फूल लगते हैं । कचपच -संज्ञा पुं० गिचपिच । कचपची संज्ञा खी० - १. कृत्तिका नक्षत्र । २. चमकीले बुंदे जिन्हें खियाँ माथे आदि पर चिपकाती हैं । कचपेंदिया - वि० १. पेंदी का कमज़ोर । २. बात का कच्चा । कचर-कचर -संज्ञा पुं० १. के खाने का शब्द । २. बकवाद । कचरकूट - संज्ञा पुं० १. मारकूट । २. खूब पेट भर भोजन । कचरना - क्रि० स० १. रौंदना । २. खूब खाना । कच्चे फल कचरी - संज्ञा खो० कचरी के फल के तले हुए टुकड़े | कचलोंदा - संज्ञा पुं० ले |ई । कचलान - संज्ञा पुं० एक प्रकार का लवण जो कांच की भट्ठियों में जमे हुए चार से बनता है कचहरी - संज्ञा स्त्री० न्यायालय । कचाई -संज्ञा स्त्री० कच्चापन | कचायँध - संज्ञा स्त्री० कच्चेपन की महक । कचारना - क्रि० स० कपड़ा धोना । कचालू -संज्ञा पुं० १. एक प्रकार की रुई । बंडा । २. एक प्रकार की चाट । कचीची - संज्ञा स्त्री० जबड़ा । दाढ़ । कचूमर - संज्ञा पुं० १. कुचलकर बनाया