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पृष्ठ:बाल-शब्दसागर.pdf/९३

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भारत आरन - संघा पुं० जंगल | आर पार -संज्ञा पुं० यह छोर और वह छोर । कि० वि० एक तल से दूसरे तल तक । आरब्ध - वि० आरंभ किया हुआ । आरस -संज्ञा पुं० दे० " आलस्य" । संज्ञा स्त्री० दे० "आरसी" । श्रारसी - संज्ञा स्त्री० आईना | आरा -संज्ञा पुं० [स्त्री०, अल्पा० भारी ] लोहे की दाँतीदार पटरी जिससे रेतकर लकड़ी चीरी जाती है । श्राराति -संज्ञा पुं० शत्रु । बैरी । आराधक - वि० [स्त्री० धाराधिका] उपा- सक । पूजा करनेवाला । श्राराधन-संज्ञा पुं० सेवा । पूजा । श्राराधना-संज्ञा स्त्री० पूजा । उपा- सना । श्राराम - संज्ञा पुं० [सं०] बाग़ । उपवन । दम संज्ञा पुं० [फा०] १. चैन । सुख । २. चंगापन । ३. विश्राम । लेना । श्रीराम कुरसी - एक प्रकार की लंबी कुरसी । श्राराम-तलब - वि० १. सुख चाहने- वाला । सुकुमार । २. सुस्त । आलसी । श्रारी -संज्ञा स्त्री० [हिं० भारा का अल्पा०] लकड़ी चीरने का बढ़ई का एक औ- ज़ार | छोटा धारा । आरूढ़ - वि० [सं०] १. चढ़ा हुआ । २. दृढ़ । ३. तत्पर । आरोग्य - वि० रोग-रहित । स्वस्थ । आरोग्यता-संज्ञा स्त्री० स्वास्थ्य | प्रारोधना- क्रि० स० रोकना । ६५ श्रार्यपुत्र आरोप-संज्ञा पुं० स्थापित करना । श्रारोपण - संज्ञा पुं० १. स्थापित करना । २. रोपना । आरोपना-क्रि०स० स्थापित करना । श्रारोपित - वि० १. स्थापित किया हुआ । २. रोपा हुआ । श्रारोह-संज्ञा पुं० १. चढ़ाव । २. श्राक्रमण । ३. सवारी । श्रारोहण - संज्ञा पुं० चढ़ना । सवार होना । श्रारोही - वि० [स्त्री० श्रारोहिणी] चढ़ने- वाला । संज्ञा पुं० १. संगीत में वह स्वर-साधन जो पड़ज से लेकर निषाध तक उत्त- रोत्तर चढ़ता जाय । २. सवार । श्राप्त- वि० १. पीड़ित । २. दुखी । ३. अस्वस्थ | श्राच ता-संज्ञा स्त्री० १. पीड़ा । २. दुःख । श्रत नाद-संज्ञा पुं० दु:ख सूचक शब्द । श्रच स्वर-संज्ञा पुं० दु:ख-सूचक शब्द । आर्थिक - वि० धन-संबंधी । 'द्रम्प- संबंधी । श्राद्र- वि० गीला । आर्द्रा -संज्ञा स्त्री० १. सत्ताईस नक्षत्रों में छठा नक्षत्र । २. वह समय जब सूर्य नक्षत्र का होता है। आर्य - वि० श्रेष्ठ । पूज्य । संज्ञा पुं० मनुष्यों की एक जाति जिसने संसार में बहुत पहले सभ्यता प्राप्त की थी । श्रार्यपुत्र संज्ञा पुं० पति को पुका रने का संबोधन ।