पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१३५

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( १२२ ) नीचे रहने लगे। रहते रहते उरुविल्वकाश्यप और भगवान बुद्धदेव में मैत्री हो गई और धीरे धीरे उरुविल्वकाश्यप की यह मैत्री श्रद्धा और भक्ति में परिणत होने लगी। एक दिन बुद्धदेव ने समय देख उरुविल्वकाश्यप से अध्यात्म-कथा प्रारंभ की और कहा- ' न नग्नचरिय न जटान पंक अनासका थंडिलसायिका वा। रजो च भल्लं, उक्कुटकप्पधानं, शोधंति मिचं अवितीप्णकंख । हे विल्वकश्यप ! जिसकी कांक्षा दूर नहीं हुई है, उस मनुष्य को न नग्न रहना पवित्र कर सकता है और न जटा रखने और पंक लपेटने से वह पवित्र हो सकता है। उसके लिये अनशन व्रत और.अग्न्यागार में भूमिशयन करना, शरीर में भस्म रमाना और उकडू बैठे रहना सव व्यर्थ है। “विल्वकाश्यप को भगवान गौतम बुद्ध की यह बात सुन ज्ञान हो गया। उसने अपने मन में कहा-"सच है, तब व्यर्थ अपना समय मैंने अव कर्मकांड के आडवर में गँवाया और अध्यात्म की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। अच्छा, जभी से सोचा जाय, तमो से सही।" यह विचार विल्वकाश्यप अपने तीन हजार अंते- 'वासियों के साथ भगवान् बुद्धदेव का उपदेश सुन परिव्राज्य ग्रहण के लिये उद्यत हो गया और उसने अपनी अरणी आदि अग्निहोत्र के साधनों को निरंजरा नदी में प्रवाहित कर दिया। भगवान बुद्ध ने उसे और उसके शिष्यों को ब्रह्मचर्य का उपदेश दे उन्हें संन्यास ग्रहण कराया।