पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१७८

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( १६५ ) की दशा में अलौकिक परिवर्तन होता है, वह महापुरुष अवश्य दर्श- नीय और पूजनीय हैं।" यह विचार उसने अपनी दासी से भग- वान के सारे उपदेशों को जो उन्होंने माली के यहाँ दिए थे, शब्द प्रति शब्द सुना और उसे उनके दर्शनों की विशेष उत्कंठा हुई। उसने अपनी दासीसे पूछा-" भगवान् बुद्धदेव किस मार्ग से मिक्षा के लिये नगर में पाया जाया करते हैं ?" और जब उसे यह ज्ञात हुआ कि भगवान् उसके महल के नीचे से होकर भिक्षा के लिये नगर में आते जाते हैं, तब उसने अपने प्रासाद की दोवार में उनके दर्शन के लिये एक रंधू बनवाया और वह उसमें से नित्य प्रति भगवान के दर्शन करने लगी। एक दिन देवयोग से मागंधी, जो भगवान बुद्धदेव के तिरस्कार करने से उनसे मन ही मनजलती थी, श्यामावती के प्रासाद में गई। वहाँ इधर उधर घूमते हुए उसकी दृष्टि उस रंधू पर पड़ी जिसे श्यामावती ने भगवान् बुद्धदेव के दर्शन के लिये बनवाया था। मागंधी ने श्यामावती से पूछा- बहन, यह रंधू किस लिये है ?" श्यामावती ने कहा-"यह रंधू मैंने भगवान् बुद्धदेव के लियेवनाया हैं और जब भगवान इस मार्ग से जाते हैं, तब मैं उनके दर्शन करती हूँ।" यह सुन मांगंधी मौन हो गई और उसने अपने घर आ श्यामावती से सवतिया डाह निकालने का इसे. एक अच्छा शस्त्र बनाया,। . . . ..एक दिन जब महाराज उदयन मागंधो के महल में आए तब उसने श्यामावती की अनेक प्रकार से निंदा कर के कहा-"महा-