पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१८

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(५)

को दुर्गघि से सहस्रों वार दूपित हुई। स्वर्ग की कामना ने सहस्रों बार स्वर्गलोलुप यजमानों को पृथ्वी को पशुओं के रक्त से क्यारी की तरह सींचने के लिये वाध्य किया। श्रीमानों ने बड़े बड़े पशु- हिंसावाले यज्ञ करने ही में अपनी इतिकर्तव्यता और अपने ऐश्वर्या की शोभा समझी थी। यज्ञमंडप लोलुप यजमानों का क्रीड़ागार बना था। लोभ और काम ने याजकों को यहाँ तक घेरा या कि पुष्कल धन देनेवाला उनके लिये सभी कुछ था । अन्य ग्रंथों की तो बात ही क्या है, स्वयं ऋग्वेद के दक्षिणासूक्त में दक्षिणा देनेवालों को ऋपि, ब्रह्मा, समग आदि सभी कुछ कहा गया है और यजुर्वेद अध्याय २३ में उन हँसी और दिल्लगियों का नमूना मौजूद है जो याज्ञिक लोग यज्ञमंडप में यजमान की कुटुं विनी स्त्रियों से करते थे और जिसका समर्थन शतपथ ब्राह्मण कांड १६ अध्याय २ से भी होता है। अविद्या का इतना प्रसार था और पक्षपात ने इतना घेर लिया था कि शूद्र तो असंभाष्य ही थे, द्विजों में भी कुछ थोड़े इने गिने ब्राह्मण और क्षत्रियों के अतिरिक्त शेष लोग मूर्ख ही रहते थे। ब्रह्मबंधु, राजन्यवंधु शब्द जिनका अर्थ अशिक्षित ब्राह्मण और अशिक्षित क्षत्रिय है, ब्राह्मण ग्रंथों तक में मिलते हैं । कहाँ वेदों की यह शिक्षा कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र क्या अंत्यजों तक मनुष्य

  • वनु ऋषि तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्य सामगामुक्यशासम् ।

स शुमास्य तन्यो वेद तिस्रो अमनो दक्षिणया राघ।