पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१८०

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मोजन कराया। उस दिन महाराजच्टयन भीश्यामावती के प्रासाद में उपस्थित रहे और भगवान् को सप्रीति भोजन करा के उन्होंने उनके उपदेश सुने। ___ यह सब समाचार सुनकर नागंधी और अधिक कुढ़ी और उत्तने कई लड़कों को लोभ देकर भगवान बुद्धदेव और संघ के लोगों ने जब वे नगर भिज्ञा के लिये निकलते थे. गाली दिलवाना प्रारंभ किया । यद्यपि गालियों से भगवान बुद्धव बो हुन्छ कष्ट न हुआ, पर उनके संप के मित्रों को बहुत दुःख पहुँचा । उनके दुःख से दुःली हो आनंद ने एक दिन भगवान् ले रहा-"महाराज! यहाँ के लोग बड़े दुष्ट हैं । यह लोग गाली देकर आपके भिनओं का अपनान करते हैं। अतः अब यहाँ से अन्यत्र चलना चाहिए। चातुर्मास्य भो अब अंत को पहुँच गया है। आनंद की यह बात सुन भगवान् बुद्धदेव ने कहा- अहं नागोव संगानं चपतो पवितं सरं। अतिवास्त्वं विविक्तिसं दुल्सीलो हि बहुजनो। हे आनंद संसार में चारों ओर दुःशील पुरुष हैं : तुन कहीं लाकर उनसे नहीं बच सकते हो। वो हाथी की तरह, जैसे वह संग्राम में धनुष से निकले हुए बाणों को सहता है वैसे, इनके गाली- प्रदान को सहता हुआ अविवाक्य की तिविज्ञा करूंगा। .. • जब नागपो गाली दिलाकर थक गई और महात्मा बुद्धदेव और मिनु वहाँ से न टले और उवर इयानावती को राजा और मी चाहने लगे, तब उसने एक दिनवन्य कुक्कुट मँगवाकर महाराज