पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२०

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पर विद्वान् लोग उनपर अपने विचार प्रगट करते रहे; पर सर्व- साधरण का ध्यान उनके गूढ़ तत्वों की ओर नहीं गया था। उपनिषदों का समय आया और चला गया, पर किसी को भी कर्मकांड का विरोध करने का साहस नहीं हुआ। कुछ इने गिने विद्वान् लोग अवश्य, यथासमय वैदिक काल से ही, विज्ञान वा अध्यात्मवाद की झलक दिखाते रहे। पर राजाओं का विशेष लक्ष्य यज्ञ ही रहा। हाँ, कहीं कहीं कोई कोई राजर्षि जनक आदि आध्यात्मविद्या के सच्चे प्रेमी और जिज्ञासु देख पड़ते थे।

प्राचीन इतिहास और साहित्य पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि याज्ञिक और अध्यात्मवाद, उभय पक्ष, इस आर्थ्या- वर्त में कई कई वार बारी बारी से प्रवल हुए और फिर उनका हास हुआ। सब ने बारी बारी संहिताओं का संकलन किया जो पीछे कालांतर में या तो विरोध से या किसी और कारण से लुप्त-प्राय हो गई । इन सहसों वर्षों के परस्पर के झगड़े का परिणाम यह हुआ कि याज्ञिकों ने अध्यात्मवादियों के मत-की उत्कृष्टता को स्वीकार कर लिया। दोनों पक्षों के कर्मक्षेत्र के बीच सीमा वन गई और कर्मकांडियों ने अपना लक्ष्य स्वर्ग और ज्ञानकांडियों ने अपनो लक्ष्य मोक्ष रक्खा ।

अध्यात्मवाद की एक बार फिर उन्नति हुई। सांख्य योगादि विपयों पर ग्रंथ रचे गए । कणाद ने वैशेषिक शास्त्र की रचना की और गोतम ने न्याय शास्त्र रचा। महाभारत के युद्ध के समय महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास ने अवतार लिया। इन महानुभाव ने