पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२००

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( १८७ ) श्रावस्ती से भगवान संघ समेत देशाटन को निकले और भिन्न भिन्न स्थानों में विचर कर उपदेश करते रहे । वर्षा ऋतु के आगमन पर भगवान् पालवी ग्राम में पधारे और वहाँमहाराज के वनवाएएक आराम में ठहराकर उन्होंने अपना सोलहवाँचातुर्मास्य व्यतीत किया। आलवी ग्राम में सोलहवाँ चातुर्मास्य व्यतीत कर भगवान् बुद्ध- देव श्रावस्ती होते हुए राजगृह गए और वहाँ गृधूकूट पर ठहरे। वहाँ भगवान् दो वर्ष तक रहे और अपना सत्रहवाँऔर अठारहवाँ चातु- मस्यि उन्होंने वहीं व्यतीत किया। ___इन दो वर्षों में देवदत्त ने उनके साथ अनेक चालें चली। पहले तो उसने भगवान् से यह कहा कि राजाओं के उत्तराधिकारी युवराज होते हैं। आप धर्मराज हैं। आपको उचित है कि आप मुझे अपने युवराज पद पर नियुक्त कीजिए । भगवान् बुद्धदेव ने उसकी बात सुनकर कहा-"देवदत्त ! अपने प्रिय शिष्य सारिपुत्र और मौद्गलायन के होते हुए हमें किसी को युवराज के पद पर नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है।" देवदत्त भगवान् का यह उत्तर सुन उनसे और खिन्न हो गया और उनका विरोध करने के लिये प्रयत्न करने लगा। - कहते हैं कि जिस वर्ष भगवान् बुद्धदेव ने अपना पंद्रहवाँ चातु- मर्मास्य कपिलवस्तु में वितायो था, उसी वर्ष महाराज विंबसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को, जिसकी अवस्था सात वर्ष की थी, युवराज पद् पर अभिषिक्त किया था। यह अजातशत्रु देवदत्त का अनन्य भक्त मलमा