पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२०६

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( १९३ ) ने भगवान् का यह उपदेश सुन बौद्ध धर्म स्वीकार किया और जब तक भगवान बुद्धदेव राजगृह में रहते थे, वह प्रति दिन तीन बार उनके दर्शन को आया करता था। '. भगवान बुद्धदेव ने अपना वीसवाँ चातुर्मास्य राजगृह में व्यतीत किया। यह उनका अंतिम चातुर्मास्य था जो उन्होंने राजगृह में किया था। राजगृह में देवदत्त का अधिकार वहुत बढ़ गया था और वह राज- कुमार का गुरु बना हुआ था। राजकुमार अजातशत्रु उसके हाथ में था और काठ की पुतली की तरह उसके कहने पर काम करता था । देवदत्त के संग में रहकर राजकुमार का खभाव क्रूर हो गया था । वह वात वात में अपने पिता महाराज बिंबसार की अवज्ञा करता था और सदा उन लोगों को जो बूढे महाराज के विश्वासपात्र और प्रीति-भाजन थे, कष्ट पहुँचाया करता था । सच है, संगत का बड़ा प्रभाव होता है। ___ महात्मा बुद्धदेव ने जब यह देखा कि दुष्ट अजातशत्रु अपने पिता के इष्टमित्रों और विश्वासपात्र पुरुषों को कष्ट देने पर तुला हुआ है, तब वे अपना बीसवाँ चातुर्मास्य येन केन प्रकारेण राजगृह में विताकर श्रावस्ती को चले गए; और आगे के लिये उन्होंने यह संकल्प किया कि अव यावज्जीवन श्रावस्ती के अतिरिक्त अन्यत्र वर्षा ऋतु व्यतीत न करूंगा।