पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२०८

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(३२) जातिवाद कहते हैं कि एक दिन भगवान अपना भिक्षापात्र उठा भिक्षा के ‘लिये जेतवन से निकले और श्रावस्ती के पास ही एक ग्राम में भिक्षा के लिये गए । उस गांव में अग्नीक भारद्वाज नामक एक वेदपारग 'अग्निहोत्री ब्राह्मण रहता था । गौतम बुद्ध उसके द्वार पर मिक्षा के लिये गए। उस समय भारद्वाज अग्निहोत्र कर रहा था। उसने बुद्ध- देव को भिक्षा के लिये द्वार पर खड़े देखकर कहा-“हे मुंडी, हे वृषल, वहीं रहो, भीतर मत आओ।" भगवान बुद्धदेव ने उसकी स्वात सुनकर कहा-'भारद्वाज ! क्या तुम जानते हो कि वृषल किसे कहते हैं ?" भारद्वाज ने कहा-"नहीं, मैं तो नहीं जानता कि वृपल किसे कहते हैं ।। आपही वतलाइए। इस पर भगवान् बुद्ध- देव ने उसे उपदेश करना प्रारंभ किया और कहा,- ____"चाहे द्विज हो वा शूद्र, जो दयाहीन पुरुष प्राणियों की हिंसा करता है, वही वृषल है । गांव और नगर के मार्ग को जो बंद करता वा रुघता है, उसे वृषल कहते हैं। चाहे गृही हो वा वनी, जो पराया धन हरता वा चोरी करता है वा विना दिए हुए पदार्थ को ले लेता है, वही वृषल है। जो ऋणं लेकर मांगने परभाग जाता है वा मांगने पर यह कहता है कि मैं तुम्हारा ऋणी नहीं हूं, वही वृंषल है । जो ‘अपने वा पराए स्वार्थ के लिये-धन लेकर मिथ्या साक्षी देता है,वही वृषलाहै । जो जाति, मित्रं.या सखा की-स्त्री कोसहसा दूपित करता है वही वृषल है।जोमाता पिता आदि पूज्यबृद्धजनों का भरणपोषण