पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२३५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( २२२ ) चलकर वे भिक्षु संघ के साथ कक्कुत्था नदी के किनारे पहुँच । वहाँ पर भगवान् बुद्धदेव ने कक्कुत्या नदी के शीतल जल में स्नान किया और थोड़ा सा पानी पिया और उस नदी के किनारे एक आम के बाग में जो चुद का था, वे ठहरे। चुंद ने, जो उनके साथ साथ पावा से उन्हें पहुँचाने आया था, वहाँ पर एक कपड़ा विछा दिया । उसी कपड़े पर लेटकर भगवान बुद्धदेव ने थोड़ी देर तक विश्राम किया और फिर वहाँ से वे संघ समेत कुशीनगर को चल पड़े। ___ मल्लों की राजधानी कुशीनगर हिरण्यवती नदी के किनारे थी। भगवान बुद्धदेव हिरण्यवती पार कर नगर के किनारे शाल के एक वन में ठहरे । वहाँ उनका रोग और भी बढ़ गया। उनके हाथ पैर ढीले पड़ गए। संघ के लोग घबरा गए। उसी शाल-बन में द्रोणा- चार्य के गोत्रज एक ब्राह्मण रहते थे। उन्हीं की कुटी के पास लोगों ने एक खाट लाकर साखू के दो पेड़ों के बीच में बिछा दी। उसी खाट पर भगवान बुद्धदेव उत्तर की ओर सिर कर के लेट गए । यह वथागत का अंतिम लेटना था। उनकी यह अवस्था देखकर आनंद ने उनसे पूछा-"भगवन् ! अब आपको अंतिम अवस्था है, कृपा- कर यह बता दीजिए कि स्त्री-जाति से हम लोग कैसा बर्ताव करें ? भगवान् बुद्धदेव ने कहा-"प्रदर्शन अर्थात् उनसे न मिला करना।” आनंद ने कहा-"भगवन् ! यदि उनका दर्शन हो ही जाय वो क्या करना चाहिए ?" । भगवान् बुद्ध ने कहा-"अनालाप"