पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


(१४ )

इसी शाक्यवंश में बहुत दिनों पीछे ? उल्कामुख नामक राजा हुआ जिसके अमृता नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। अमृता अत्यंत रूपवती थी, पर यौवनावस्था प्राप्त होने पर वह कुष्ट रोग से पीड़ित हुई। राजकुमारी के रोग-नाश के लिये अनेक प्रयत्न किए गए, पर रोग बढ़ता गया और समस्त शरीर में खूण हो गए । राजकुमारों ने जव देखा कि उसे असाध्य रोग हो गया तो वे उसे गाड़ी पर चढ़ा 'हिमालय के एक उत्संग पर्वत की गुहा में ले गए और वहीं छोड़ आए । वहाँ रहने से थोड़े ही दिनों में राजकुमारी अमृता नीरोग हो गई और उसी गुहा में रहने लगी । उस गुहा के समीप राजपि कोलि का आश्रम था। राजपि कोलि उस आश्रम में रहकर तोर्मः ...... तस्य प्रसेनजित् वस्य तक्षयाः तस्य दलः । प्रती युधि ठिरस्य समकालीन: भारते युद्धे शभिगम्युना इतः । तस्य दृद्रणः, तस्य उरुझियः, तस्य यत्रावृतः, तस्य मतिव्योमः, तल्प भानुः, तस्य देवाकः, तस्य सहदेवः, तस्य पीर, वृदयः, तस्य भानुनान, तस्य प्रती. शाश्वः, तस्य भुप्रयोकाश्यः, तस्य गुप्रतीकः, तस्य सपदेषः, तस्य सुन- क्षत्रः, वस्य पुष्करः, तस्य अंतरिक्षः, तस्य गुतापः, तस्य अमिनजित्, तस्य वृहद्रजः, तस्य यदिः, तस्य कृतंजयः, तस्य संजयः तस्य संजयः तस्य शाक्य, वस्य शुद्धोदः ( शुद्धोदन: ?) __* सहायंश में भान्धाता और उपकामुख के बीच निम्नलिखित राजानों के नान मिलते है । घरमांधाता, घरक, उपपरफ, चैत्य, मुघल, महामुघल, शुचलिंद, सगर, सागरदेव, भरत, भगीरथ, रुचि, सुरुचि, प्रताप, महामताप, प्रशाद, महामणाद, सुदर्शन. महामुदर्शन, नेरु, महानेरु, फिर ८४900 खा जिनका नाम नहीं दिया है, और उल्फाद जिरो उएकामुख का पिता लिखा है। +किसी किदी का भव है कि राजर्षि कोलि पहले वाशी के राजा थे। । उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। वे काशी त्यागकर हिमालय में रहते थे और