पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१५३

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मानसरोवर 1 बर और वधू सबके दिलों में पहुंचती थी। अब तुमने उसका दरवाजा बन्द कर दिया। अब वहाँ सिर्फ तुम हो । इसलिए उसको आवाज तुम्ही को पसन्द भाती है। यह दिल अब तुम्हारे सिवा और किसी के काम का नहीं रहा। चलो, आज तक तुम मेरे गुलाम थे; माज से मैं तुम्हारी लौंडी होती हूँ। चलो, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूंगी। भाज तुम मेरे मालिक हो। थोड़ी सी आग लेकर इस झोपड़े में ला दो। इस डफ, को उसो में जला दूंगी। तेहरान में घर-घर आनंदोत्सव हो रहा था। आज शाहजादा नादिर लैला को ब्याह कर घर लाया था। बहुत दिनों के बाद उसके दिल की मुराद पूरी हुई थी। सारा तेहरान शाहजादे पर जान देता था और उसकी खुशी में शरीक था । बादशाह ने तो अपनी तरफ से मुनादी करवा दो थी कि इस शुभ अवसर पर धन और समय का अपव्यय न किया जाय, केवल लोग मसजिदों में जमा होकर खुदा से दुआ मांगें कि ; चिरजीव हों और सुख से रहें । लेकिन अपने प्यारे शाहलादे की शादी धन, और धन से अधिक मूल्यवान समय का मुंह देखना किसी को गवारा न था । रईसों ने महफिलें सजाई, चिराग जलाये, बाजे बजवाये, गरीबों ने अपनी डफलियाँ संभाली और सड़कों पर घूम-घूमकर उछलते-कूदते फिरे । सन्ध्या समय शहर के सारे अमीर और रईस शाहलादे को बधाई देने के लिए पीवाने खास में जमा हुए। शाहजादा इत्रों से महकता, रत्नों से चमकता और मनो- स्लास से खिलता हुआ आकर सबा हो गया। काजी ने अर्ज की-हुजूर पर खुदा की बरकत हो। हजारों आदमियों ने कहा-आमीन! शहर को ललेनाएँ भी लैला को मुबारकबाद देने आई। लैला बिलकुल सादे कपड़े पहने थी। आभूषणों का कहीं नाम न था। एक महिला ने कहा-आपका सोहाग सदा सलामत रहे । हजारों कण्ठों से ध्वनि निकली-आमीन। ४ ) कई साल गुजर गये । नादिर अब बादशाह था और लैला उसकी मलका । ईरान का शासन इतने सुचारु रूप से कभी न हुआ था। दोना हो प्रजा के हितैषों थे, दोने ही उसे सुखो और सम्पन्न देखना चाहते थे । म ने वे सभी कठिनाइयाँ दूर कर दो,