पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१७९

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TVC मानसशक्ष दिये। उसी तरह सुसकिराये, जैसे कई गास पहले प्रधान महोदय मुसकिराये थे। अब उनके सुसकिराने का आशय समझ रहा हूँ, उस समय न समझ सका था। बस, इतनी ही ज्ञान को वृद्धि हुई है। उस मुसकान में कितना व्यंग्य था, मेरे बाल व्रत का कितना उपहास और मेरी सरलता पर कितनी दया थो, अर उस हा मर्म समम्मा हूँ ! मैं कालेज में अपने व्रत पर दृढ़ रहा। मेरे कितने ही मित्र इतने संयमशील न थे। मैं आदर्श चरित्र समझा जाता था। कालेज में उस स शोर्णता झा निर्वाह कहाँ ! बुधू बना दिया जाता, कोहे मुला की पदवी देता, कोई नासेह कहकर मजाक उकाता। मित्रगण व्यग्य-भाव से कहते-'हाय अपसोस, तू ने पो ही नहीं ।' साराश यह कि यहाँ मुझे उदार बनना पड़ा। मित्रों को अमरे में चुसकियाँ लगाते देखता, और जैठा रहता। भा घुटती, और मैं देखा करता । लोग आग्रह-पूर्वक कहते-'अजो, जारा लो भी!' तो विनीत भाव से कहता-'क्षमा कीजिए, यह मेरे सिरटम को सृट नहीं करती । सिद्धान्त के बदले अब मुझे शारीरिक असमर्थता का बहाना करना पटा । वह सत्याग्रह का जोश, जिसने पिता की बोतल पर हाथ साफ किया था, ग्रायत्र हो गया था। यहाँ तक कि एक बार जब कालेज के चौथे वर्ष में मेरे लड़का पैदा होने की खबर मिली, तो मेरी उदारता को हद हो गई। मैंने मित्रों के आग्रह से मजबूर होफर उनकी दावत की, और अपने हाथों से डाल-डालकर उन्हें पिलाई । उस दिन सानो बनने में हार्दिक थानन्द मिल रहा था। उदारता वास्तव में सिद्धान्त से गिर जाने, भादर्श से च्युत हो भने का ही दूसरा नाम है। अपने मन को सम- माने के लिए युक्तियों का अभाव कभी नहीं होता। संसार में सबसे आधान काम अपने को थोखा देना है। मैंने खुद तो नहीं पी, पिला दी, इसमें मेरा क्या नुकसान ? दोस्तों को दिनशिकनी तो नहीं को ? मला तो जभी है कि दूसरा को पिलाये और खुद न पिये। खैर, कालेज से मैं बेदाय निकल आया। अपने शहर में वकालत शुरू की। सुमह से आधी रात तक चक्को में जुतना पाता। वे कालेज के सैर सपाटे, आमोद- विनोद, सब स्वप्न हो गये । मित्रों की आमद रफ्त बन्द हुई। यहाँ तक कि छुट्टियों में भी दम मारने की फुरसत न मिलती। जीवन-संग्राम जितना विकट है, इसका अनुभव हुआ। इसे संग्राम बहना ही भ्रम है। संग्राम की उमङ्ग, उत्तेजना, वीरता और जय-ध्वनि यहाँ कहाँ ? यह संग्राम नहीं, ठेलमठेल, धक्का-पेल है। यहाँ.'चाहे