पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२५४

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डिका क रुपये २५३ उसने पूछा - क्या चीज़ ? नईम-मिसेज़ कैलास से एक मिनट तक एकान्त में बात चीत करने की आज्ञा । कैलाश ने नईम के सिर पर एक चपत जमाकर कहा-फिर वही शरारत ! सैकड़ों बार तो देख चुके हो, ऐसी कौन सी इन्द्र की अप्सरा है? नईम-वह शछ भी हो, मामला करते हो, तो करो, मगर याद रखना, एकांत' की शर्त है। कैलास-मजूर है। फिर जो रिको के अपये मांगे गये, तो नोच ही खाऊँगा। नईम-हाँ मजूर है। कैलास-(धीरे से ) मगर यार, नाजुक मिजाज स्त्री है। कोई बेहूदा मजाक न कर पेठग। नईम-जी, इन बातों में मुझे आपके उपदेश की जकात नहीं। मुझे उनके कमरे में ले तो चलिए । कैलास-सिर नीचे किये रहना। नईम-अभी, आँखो में पट्टी बाँध दो। कैलास के घर में परदा न था, उमा चिन्ता-मग्न बैठी हुई थी। सहसा नईम और कैलास को देखकर चौंक पढ़ी। बोली-आइए मिरजाजी, अच्छी तो बहुत दिनों में याद किया। कैलास नईम को वहीं छोड़कर कमरे से बाहर निकल थाया , लेकिन परदे को आड़ से छिपकर देखने लगा कि इनमें क्या बात होती हैं। उसे कुछ बुरा ख्याल न था, पेवल कौतूहल था। नईस-हम सरकारी आदमियों को इतनी फुरसत कहाँ ? डिको के रुपये वसल करने थे, इसीलिए यला आया है। उमा कहाँ तो मुसकिरा रही थी, कहा रुपये का नाम सुनते ही उसका चेहरा पाक हो गया। गम्भीर स्वर में बोली- हम लोग स्वयं इसो चिन्ता मे पड़े हुए हैं। कहीं रुपये मिलने को आशा नहीं है , और उन्हें जनता से अपील करते संकोच होता है। नईम-खजी, आप कहती क्या हैं ? मैंने सब रुपये पाई-पाई बसल कर लिये। उमा ने चकित होकर कहा---सच ! उनके पास रुपये कह थे? नईम-उनकी हमेशा से यही भादत है। मापसे कह रस्सा होगा, मेरे पास