पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/८५

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2 ( ४ ) एक महीना गुजर गया। गाँववाले अपने काम-धन्धे में लगे। घरवालों ने रो- धोकर सब किया। पर अभागिनी विधवा के मासू कैसे पुंछते । वह हरदम रोती रहती । अखि चाहे बन्द भी हो जाती, पर हृदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा ? किस आधार पर जिऊँगी ? अपने लिए जीना या तो महा- स्माओं को आता है या लपटों ही को। अनूपा को यह कला क्या मालूम ? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सर्वस्व समहो, जिसके लिए वह जिये, जिस पर वह घमड करे । घरवालों को यह गवारा न था कि यह कोई दूसरा घर करे । इसमें न्दनामी थी। इसके सिवा ऐसी सुशीळ, घर के कामों में ऐसी कुशल, लेन-देन के मामले में इतनी चतुर और रंग-रूप की ऐसी - सराहनीय स्त्री का किसी दूसरे के घर पर जाना ही उन्हें असह्य था। उधर अनूपा के मैकेवाले एक जगह बात-चीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गई, तो एक दिन अनूपा का भाई उसे विदा घराने आ पहुंचा। अब तो घर में खलबली मची। इधर से कहा गया, हम बिदा न करेंगे ; भाई ने कहा, हम बिना भिदा कराये मानेंगे नहीं। गांव के भादमी जमा हो गये, पञ्चायत होने लगी । यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड़ दिया जाय । उसका जी चाहे, चली, माय, जी चाहे, रहे । यहाँवालों को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने पर राजी न होगी, दो-चार बार वह ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन इस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा । डोली आ गई । गाँव भर को स्त्रियाँ उसे देखने आई। अनूपा उठकर अपनी सास के पैरों पर गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली- अम्मा, कहा-सुना मान करना। जो में तो पा कि इसी घर में पड़ी रहूँ, पर भगवान् को मंजूर नहीं है। यह कहते-कहते उसको जबान बन्द हो गई। सास करुणा से विह्वल हो उठी। बोली-बेटी, जहाँ जाओ वहाँ सुखी रहो। हमारे भाग्य हो फूट गये, नहीं तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पड़ता ? भगवान् का दिया और सब कुछ है, पर उन्होंने जो नहीं दिया उसमें अपना क्या बस । आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो बिगड़ी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी 1