पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/८७

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. गाँव के स्त्री पुरुष उसकी यह प्रेम-तपस्या देखते और दांतों उँगली दबाते । पहले विरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जायगा और किसो तरफ़ का रास्ता लेगी, इस दुधमुंहे बालक के नाम पर कब तक ठी रहेगी। लेकिन 'यह सारो आशंकाएँ निर्मूल निकलों । अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखाजिस हृदय में सेवा का स्रोत बह रहा हो-स्वाधीन सेवा का- उसमें वासनाओं के लिए कहा स्थान ? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधार होन प्राणियों ही पर होता है। चोर की अंधेरे ही में चलती है, उजाले में नहीं। बासुदेव को भी कसरत का शौक था। उसकी शक्ल-सूरत मथुरा से मिलती- जुलती थी, डील डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अचाहा जगाया और उसकी बांसुरी की ताने फिर खेतों में गूंजने लगी। इस भाति १३ बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा में सगाई की तैयारी होने लगी। ६ ) लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने १४ वर्ष पहले वासुदेव को पतिभाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृ-भाव ने ले लिया था। उधर कुछ दिनों से वह एक गहरे सोच में डूबी रहती थी। सगाई के दिन ज्यों-ज्यों निकट माते थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बड़े परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहल उरता था। जिसे बालक की भांति पाला-पोसा, उसे पति बनाते हुए लज्जा से उसका मुख लाल हो जाता था। द्वार पर नगाड़ा बज रहा था। बिरादरी के लोग जमा थे। घर में गाना हो रहा था। आज सगाई की तिथि थी। सहसा अनूपा ने जाकर सास से कहा-अम्मा, मैं तो लाज के मारे मरो' भाती हूँ। सास ने भौंचक्को होकर पूछा-क्यों बेटो, क्या है ? अनुपा-मैं सगाई न करूंगी। -कैसी बात करती है बेटी ? सारी तैयारी हो गई। लोग सुनेंगे तो क्या सास- कहेंगे?