पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२०२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१९८ मानसरोवर . 1 हो गये । सव तैयारियों हो गई। स्टेशन समीप ही था। यहां गाड़ी देर तक खड़ी रहती थी। स्टेशनों के समीपस्थ गाँवों के निवासियों के लिए गाड़ी का आना शत्रु का धावा नहीं, मित्र का पदार्पण है। गाड़ी आ गई । सुभद्रा जलपान बनाकर पति को हाथ धुलाने आई थी। इस समय केशव की प्रेम कातर आपत्ति ने उसे एक क्षण के लिए विच- लित कर दिया। हा! कौन जानता है, तीन साल में क्या हो जाय ! मन में एक आवेश उठा-कह दूं, प्यारे. मत जाओ। थोड़ा ही खायँगे, मोटा ही पहनेंगे, रो-रोकर दिन तो न कटेंगे। कभी केशव के आने में एकआध महीना लग जाता था, तो वह विकल हो जाया करती थी। यही जी चाहता था, उड़कर उनके पास पहुँच जायें। फिर ये निर्दयी तीन वर्ष कैसे कटेंगे। लेकिन उसने बड़ी कठोरता से इन निराशाजनक भावों को ठुकरा दिया और कॉपते कठ से बोली-जी तो मेरा भी यही चाहता है। जव तीन साल का अनुमान करती हूँ, तो एक कल्प-सा मालूम होता है। लेकिन जब विलायत में तुम्हारे सम्मान और आदर का ध्यान करती हूँ, तो यह तीन साल तीन दिन से मालूम होते हैं। तुम तो जहान पर पहुंचते ही मुझे भूल जाओगे। नये नये दृश्य तुम्हारे मनोरजक के लिए आ खड़े होंगे। योरप पहुँचकर विद्वानी के सत्संग में तुम्हें घर की याद भी न आयेगी। मुझे तो रोने के सिवा और कोई धधा नहीं है। यही स्मृतियाँ ही मेरे जीवन का आधार होंगी। लेकिन क्या करूँ, जीवन की भोग-लालसा तो नहीं मानती। फिर जिस वियोग का अन्त जीवन की सारी विभूतियां अपने साथ लायेगा, वह वास्तव में तपस्या है । तपस्या के बिना तो वरदान नहीं मिलता । केशव को भी अब ज्ञात हुआ कि क्षणिक मोह के आवेश में स्वभाग्य-निर्माण का ऐसा अच्छा अवसर त्याग देना मूर्खता है। खड़े होकर बोले-रोना-धोना मत, नहीं मेरा जी न लगेगा। सुभद्रा ने उनका हाथ पकड़कर हृदय से लगाते हुए उनके मुँह की ओर सजल नेत्रों से देखा और बोली पत्र बरावर भेजते रहना। "अवश्य भेजूंगा । प्रति सप्ताह लिखू गा।" सुभद्रा ने आँखों में आँसू भरे मुसकिराकर कहा-देखना, विलायती मिसों के जाल में न फंस जाना। केशव फिर चारपाई पर बैठ गया और बोला- अगर तुम्हे यह सदेह है, तो लो मैं जाऊँगा ही नहीं। ~