पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२०५

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सोहाग का शव २०१ भी उसी जहाज़ से जा रही थीं । सुभद्रा को न जगह मिलने में कोई कठिनाई हुई, न मार्ग मे । यहाँ पहुँचकर और स्त्रियों से उसका सङ्ग छूट गया। कोई किसी विद्यालय में चली गई । दो-तीन अपने पतियों के पास चलो गई , जो यहाँ पहले से आ गए थे। सुभद्रा ने इस महल्ले में एक कमरा ले लिया। जीविका का प्रश्न भी उसके लिए बहुत कठिन न रहा । जिन महिलाओं के साथ वह आई थी, उनमें से कई उच्च अधिकारियों की पत्नियां थीं। कई अच्छे-अच्छे अंगरेज़ घरानों से उनका परिचय था । सुभद्रा को, दो महिलाओं को, भारतीय सङ्गीत और हिन्दी-भाषा सिखाने का काम मिल गया। शेप समय में वह कई भारतीय महिलाओं के कपड़े सीने का काम कर लेती है। केशव का निवास स्थान यहाँ से निकट है, इसीलिए सुभद्रा ने इस महल्ले को पसन्द किया है । कल केशव उसे दिखाई दिया था। ओह ! उन्हें 'बस' से उतरते खदे- कर उसका चित्त कितना आतुर हो उठा था । वस, यही मन में आता था कि दौड़कर उनके गले से लिपट जाय और पूछे--क्यों जी, तुम यहाँ आते ही बदल गये । याद है, तुमने चलने समय क्या-क्या वादे किये थे ? उसने बड़ी मुश्किल से अपने को रोका था। तबसे इस वक्त तक उसे मानो नशा-सा छाया हुआ है। वह उनके इतने समीप है ! चाहे तो रोज़ उन्हें देख सकती है, उनकी बातें सुन सकती है , हां, उन्हें स्पश तक कर सकती है। अब वह उससे भागकर कहाँ जायँगे ? उनके पत्रों को अब उसे क्या चिन्ता है ? कुछ दिनों के बाद सम्भव है, वह उनके होटल के नौकरों से जो चाहे, पूछ सकती है। संध्या हो गई थी। धुएँ मे बिजली की लालटेने रोधी आँखों को भांति ज्योति- हीन-सी हो रही थीं। गली में स्त्री-पुरुष सैर करने चले जा रहे थे ।। सुभद्रा स चने लगी-इन लेगों को आमोद से कितना प्रेम है, मानो किसी को चिता ही नहीं, मानो सभी सपन्न हैं । जभी यह लोग इतने एकाग्र होकर सव काम कर सकते हैं। जिस समय जो काम करते हैं, जी-जान से करते हैं। खेलने का उमग है। तो काम करने का भो उमग है और एक हम हैं कि न हँसते हैं, न रोते हैं, मौन बने बैठे रहते है । स्फूर्ति का कहीं नाम नहीं काम तो सारे दिन करते हैं, भोजन करने की फुरसत भी नहीं मिलती, पर वास्तव में चौथाई समय भी काम में नहीं लगाते । केवल काम करने का बहाना करते हैं । मालूम होता है, जाति प्राण-शून्य हो गई है। सहसा उसने केशव को जाते देखा। हाँ, केशव ही था। वह कुर्सी से उठकर