पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२०७

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सोहाग का शव किसी दूसरे मार्ग से चले गये। मेरा यहाँ खड़ा रहना लेकिन फिर खयाल आ गया, कहीं आ न रहे हों। मालूम नहीं, उसे कब नींद आ गई। (o) दूसरे दिन प्रात काल सुभद्रा अपने काम पर जाने को तैयार हो रही थी कि एक युवती रेशमी साड़ी पहने आकर खड़ी हो गई, और मुसकराकर वोलो-क्षमा कोजि एगा, मैंने बहुत सवेरे आपको कष्ट दिया । आप तो कहीं जाने को तैयार मालूम होती हैं। सुभद्रा ने एक कुर्मी बढ़ाते हुए कहा-हाँ, एक काम से बाहर जा रही यो मैं आपको क्या सेवा कर सकती हूँ। यह कहते हुए सुभद्रा ने युवती को सिर से पांव तक उसी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा, जिससे स्त्रियां हो देख सकतो हैं। सौंदर्य की किसी परिभाषा से भी उसे सुन्दरी न कहा जा सकता था। उसका रग सांवला, मुँह कुछ चोड़ा, नाक कुछ चिपटी, कद भो छोटा और शरीर भी कुछ स्थूल था । आँखों पर ऐनक लगी हुई थी। लेकिन इन सब कारणों के होते हुए भी उसमें कुछ ऐसी बात थी, जो आँखें को अपनी ओर खींच लेती थी। उसकी वाणी इतनी मधुर, इतनी सयमित, इतनी विनम्र थी कि जान पड़ता था किसी देवी के वरदान हों। एक-एक अङ्ग से प्रतिभा विकीर्ण हो रही थी। सुभद्रा उसके सामने हलकी, तुच्छ मालूम होती थी। युवती ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा "अगर मैं भूलती हूँ, तो मुझे क्षमा कीजिएगा। मैंने सुना है कि आप कुठ कपड़े भी सोती हैं, जिसका प्रमाण यह है कि यहां सीविग मशीन मौजूद है।" सुभद्रा-मैं दो लेडियों को भाषा पढाने जाया करती हूँ। शेष समय मे कुछ सिलाई भी कर लेती हूँ। आप कपड़े लाई हैं ? युवती-"नहीं, अभी कपड़े नहीं लाई ।" यह कहते हुए उसने लज्जा से सिर झुकाकर मुसकिराते हुए कहा -बात यह है कि मेरी शादी होने जा रही है। मैं वस्त्राभूषण सब हिंदुस्तानी रखना चाहती हूँ। विवाह भी चैदिक रीति से ही होगा ऐसे कपड़े यहाँ आप ही तैयार कर सकती हैं।