पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३११

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इस्तीफा . 1 गये थे। आँखों में ज्योति नहीं, हाजमा चौपट, चेहरा पीला, गाल पिचके, कमर झुकी हुई, न दिल में हिम्मत, न कलेजे में ताकत । नौ बजे दफ्तर जाते और छः बजे शाम को लौटकर घर आते। फिर घर से बाहर निकलने की हिम्मत न पड़ती। दुनिया में क्या होता है, इसकी उन्हें विलकुल खवर न थी। उनकी दुनिया, लोक- परलोक जो कुछ था दफ्तर था। नौकरी की खैर मनाते और जिन्दगी के दिन पूरे करते थे । न धर्म से वास्ता था, न दीन से नाता। न कोई मनोरजन था, न खेल। ताश खेले हुए भी शायद एक मुद्दत गुज़र गई थी। (२) जाड़ो के दिन थे। आकाश पर कुछ-कुछ बादल थे। फतहबद साढे पांच बजे दफ्तर से लौटे तो चिराग जल गये थे। दफ्तर से आकर वह किसीसे कुछ न बोलते, चुपके से चारपाई पर लेट जाते और पन्द्रह-बीस मिनट तक बिना हिले-डुले पड़े रहते। तब कहीं जाकर उनके मुँह से आवाज़ निकलती । आज भी प्रतिदिन की तरह वे चुपचाप पड़े थे कि एक ही मिनट में बाहर से किसीने पुकारा। छोटी लड़की ने जाकर पूछा तो मालूम हुआ कि दफ्तर का चपरामी है। शारदा पंति के मुंह-हाथ धोने के लिए लोटा-गिलास मांज रही थी। बोलो-उससे कह दे, क्या काम है। अभी तो दस्तर से आये ही हैं, और अभी फिर बुलावा आगया ? चपरासी ने कहा- साहब ने कहा है, अभी बुला लाओ। कोई बड़ा जरूरी काम है। फतहबन्द की खामोशी टूट गई । उन्होंने सिर उठाकर पूछा-~~-क्या बात है ? शारदा-कोई नहीं, दफ्तर का चपरासी है। फतहवद ने सहमकर कहा-दफ्तर का चपरासी । क्या साहव ने बुलाया है ? शारदा-हां, कहता है, साहब बुला रहे हैं। यह कैसा साहब है तुम्हारा, जब देखो, बुलाया करता है। सबेरे के गये गये अभी मकान को लौटे हो, फिर भी बुलावा आ गया ? फतहचद ने सँभलकर कहा जरा सुन लूँ, किस लिए बुलाया है। मैंने तो सब काम खतम कर दिया था, अभी आता हूँ। शारदा-जरा जलपान तो करते जाओ, चपरासी से बातें करने लगोगे, तो तुम्हें अन्दर आने की याद भी न रहेगी।