पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३१३

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इस्तीफा होने लगा और आधा रास्ता खतम होते-होते पैरो ने उठने से इनकार कर दिया। सारा शरीर पसीने में तर हो गया। सिर में चक्कर आ गया। आंखों के सामने तितलियां उड़ने लगीं। चपरासी ने ललकारा ---जग कदम बढ़ाये चलो धावू ! फतहचद बड़ी मुश्किल से बोले-तुम जाओ, मैं आता हूँ। वे सड़क के किनारे पटरी पर बैठ गये और सिर को दोनों हाथों से थामकर दम मारने लगे। चपरासी ने इनकी यह दशा देखो, तो आगे बढ़ा। फतहचद डरे कि यह शैतान जाकर न-जाने साहब से क्या कह दे, तो राजव ही हो जायगा । जमीन पर हाथ टेकार उठे ओर फिर चले। मगर कमज़ोरी से शरीर हाफ रहा था। इस समय कोई वच्चा भी उन्हें जमीन पर गिरा सकताथा । बेचारे किसी तरह गिरते- पड़ते साहब के बँगले पर पहुँचे । साहव बंगले पर टहल रहे थे । बार-बार फाटक की तरफ देखते थे और किमीको आते न देखकर मन-ही-मन में झलाते थे। चपरासो को देखते ही आंखें निकालकर बोले-इतनी देर कहां था ? चारासी ने बरामदे को सोढ़ी पर खड़े-खड़े कहा- हुजूर ! जब वह आयें तव तो, मैं तो दौड़ा चला आ रहा हूँ। साहब ने पैर पटककर कहा-वाबू क्या वोला ? चपरासी -आ रहे हैं हुजूर, घण्टा-भर में तो घर में से निकले । इतने में फतहचद अहाते के तार के अन्दर से निकलकर वहाँ आ पहुंचे और साहव को सिर झुकाकर सलाम किया। साहव ने कड़ककर कहा-अब तक कहाँ था ? फतहबद ने साहब का तमतमाता चेहरा देखा, तो उनका खून सूख गया । घोले-~-हुजूर ! अभी-अभी तो दफ्तर से गया हूँ, ज्योंही चपरासी ने भावाज़ दो, हाज़िर हुआ। साहव-ल बोलता है, झूठ बोलता है, हम घण्टे भर से खड़ा है। फतहचद-हुजूर, मैं झूठ नहीं बोलता। आने में जितनी देर हो गई हो; मगर घर से चलने में मुझे विलकुल देर नहीं हुई। साहब ने हाथ की छड़ी घुमाकर कहा-चुप रह, सुअर, हम धण्या-भर से खड़ा