पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३८

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३४ मानसरोवर चुके थे। उन्हें इसकी बड़ी फिक्र हुई कि किसी तरह कम-से-कम दो सौ रुपये और वसूल हो जायें। और इसकी सबसे अच्छी तरकीव उन्हें यही मालूम हुई कि वेश्याओं-द्वारा महफिल में वसूली हो। जब लोग आकर बैठ जायँ, और महफिल का रङ्ग जम जाय, तो आबादीजान रसिकजनों की कलाइयाँ पकड़-पकड़कर ऐसे हाव-भाव दिखायें कि लोग शरमाते-शरमाते भी कुछ-न-कुछ दे ही मरें। आबादी- जान और चौधरी साहब में सलाह होने लगी। मैं सयोग से उन दोनों प्राणियों की बातें सुन रहा था। चौधरी साहव ने समझा होगा, यह लौंडा क्या मतलब समझगा। पर यहाँ ईश्वर की दया से अक्ल के पुतले थे। सारी दास्तान समझ में आती जाती थी। चौधरी-सुनो आवादीजान, यह तुम्हारी ज्यादती है। हमारा और तुम्हारा कोई पहला साबिका तो है नहीं। ईश्वर ने चाहा, तो यहाँ हमेशा तुम्हारा आना- जाना लगा रहेगा। अबकी चन्दा बहुत कम आया, नहीं तो मैं तुमसे इतना इसरार न करता । आवादी 10-आप मुझसे भी ज़मींदारी चालें चलते हैं, क्यों ? मगर यहाँ हुजूर की दाल न गलेगी। वाह ! रुपये तो मैं वसूल करूँ, और मूछों पर ताव आप दें। कमाई का यह अच्छा ढग निकाला है। इस कमाई से तो वाकई आप थोडे दिनों मे राजा हो जायेगे। उसके सामने ज़मींदारी झक मारेगी! बस, कल ही से एक चकला खोल दीजिए ! खुदा की कसम, मालामाल हो जाइएगा। चौधरी-तुम तो दिल्लगी करती हो, और यहाँ काफिया तग हो रहा है। आबादी० -तो आप भी तो मुझी से उस्तादी करते हैं। यहाँ आप जैसे कॉइयो को रोज उँगलियों पर नचाती हूँ। चौधरी-आखिर तुम्हारी मशा क्या है ? आबादी -जो कुछ वसूल करूँ, उसमें आधा मेरा और आधा आपका। लाइए, हाथ मारिए। चौवरी-यही सही। आवादी० -अच्छा, तो पहले मेरे सौ रुपये गिन दीजिए। पीछे से आप अलसेठ करने लगेंगे। चौधरी-वाह ! वह भी लोगी और यह भी। OS