पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/९१

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हिसा परमो धर्म . पण्डितजी पूरी कथा सुनने के लिए और भी व्याकुल हो उठे। इन्दिरा के साथ ही वह भी घर में चले गये , पर एक ही मिनट के बाद वाहर आकर जामिद से बोले-भाई साहब, शायद आप बनावट समझे , पर मुझे आपके रूप में इस समय अपने इष्टदेव के दर्शन हो रहे हैं। मेरो जवान मे इतनी ताकत नहीं कि आपका शुक्रिया अदा कर सकूँ । आइए, वैठ जाइए। जामिद-जी नहीं, अब मुझे इजाज़त दीजिए। पण्डित - मैं आपकी इस नेकी का क्या वदला दे सकता हूँ? जामिद-इसका बदला यही है कि इस शरारत का वदला किसी गरीब मुसल- मान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरख्वास्त है। यह कहकर जामिद चल खड़ा हुआ, और उस अंधेरी रात के सन्नाटे में शहर के बाहर निकल गया। उस शहर की विषाक्त वायु मे सांस लेते हुए उसका दम घुटता था। वह जल्द-से-जल्द शहर से भागकर अपने गांव मे पहुँचना चाहता था, जहाँ मज़हब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द या। धर्म और धार्मिक लोगों से उसे धृणा हो गई थी।