पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१५८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


जुगुनू की चमक १६६ सहायता की नीति को निभा सके तो मैं इस घटना के सम्बन्ध मे सब प्रकार का भार अपने ऊपर लेता हूँ। दरवार अपने को इस विषय में निदोप समझे और इसकी सर्वसाधारण में घोपणा कर दे । कढ़वद खत्री गर्म होकर बोले- केवल यह घोषणा देश को भय से रक्षित नहीं कर सकती। राणा जंगबहादुर ने क्रोध से अोठ चवा लिया, किन्तु सँभलकर कहा--- --देश का शासन-भार अपने ऊपर लेनेवालों ऐसी अवस्थाएँ अनिवार्य है। हम उन नियमों से, जिन्हें पालन करना हमारा कर्त्तव्य है, मुँह नहीं मोड़ सकते। अपनी शरण में आये हुओं का हाथ पकढ़ना-उनकी रक्षा करना राजपूतों का धर्म है। हमारे पूर्व-पुरुष सदा इस नियम पर-धर्म पर प्राण देने को उद्यत रहते थे । अपने माने हुए धर्म को तोड़ना एक स्वतंत्र जाति के लिए लजास्पद है । अँगरेज हमारे मित्र है और अत्यन्त दर्प का विषय है कि बुद्धिशाली मित्र हैं। महारानी चन्द्रकुँवरि को अपनी दृष्टि में रखने से उसका उद्देश्य केवल यह था कि उपद्रवी लोगों के गिरोह का कोई केन्द्र शेष न रहे । यदि उनका यह उद्देश्य भग न हो, तो हमारी ओर से शका होने का न उन्हें कोई अवसर है और न हमें उनसे लजित होने की कोई आवश्यकता । कढ़वद-महारानी चन्द्रकुँवरि यहाँ किस प्रयोजन से आई हैं ? राणा जंगबहादुर--केवल एक शान्ति-प्रिय सुख स्थान की खोज में, जहाँ उन्हें अपनी दुरवस्था की चिन्ता से मुक्त होने का अवसर मिले। वह ऐश्वर्वशाली रानी जो रगमहलों में सुख-विलास करती थी, जिमे फूलो की मेज पर भी चैन न मिटता था-आज सैकड़ों कोस से अनेक प्रकार के कष्ट सहन करती, नदी नाले, पदाह-जगल छानती यहाँ केवल एक रक्षित स्थान की खोज में श्राई है। उमनी हुई नदियाँ और उबलते हुए नाले, बरसात के दिन । इन दुःखों को आप लोग जानते हैं। और यह उसी एक रक्षित स्थान के लिए, उसी एक भूमि के टुकड़े की आशा में | किन्तु हम ऐने त्यान-हीन हैं कि उनकी यद प्रमिलापा भी पूरी नहीं कर सकते। उचित तो यह था कि उतनी-सी भूमि के बदले हम अपना हृदय फैला देते । सोचिए, कितने अभिमान की यात है कि एक आपदा में फंसी हुई रानी अपने दुःख के दिनों में जिस देश को