पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२४४

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राज्य भक्त २६७. समय सब कुछ था। बादशाह गोरी सेना के पजे में फंस गये, तो फिर समस्त लखनऊ भी उन्हें मुक्त न कर सकता था। राजा साहब ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते थे, नैराश्य से दिल बैठा जाता था। विपल-मनोरथ होने की शका से उत्साह भग हुया जाता था। अब तक कहीं उन लोगों का पता नहीं ! अवश्य हम देर में पहुँचे। विद्रोहियों ने अपना काम पूरा कर लिया। लखनऊ राज्य की स्वाधीनता सदा के लिए विसर्जित हो गयी! ये लोग निराश होकर लौटना ही चाहते थे कि अचानक बादशाह का वार्तनाद सुनाई दिया । कई हजार कटों से आकाश भेदी ध्वनि निकली-हुजूर को खुदा सलामत रखे । हम फिदा होने को आ पहुँचे । समस्त दल एक ही प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, वेगवती जलधारा की भाँति, घटनास्थल की ओर दौड़ा। प्रशक्त लोग भी सशक्त हो गये। पिछले हुए लोग भागे निकल जाना चाहते थे। यागे के लोग चाहते थे कि उदार जा पहुँचे! इन आदमियों की श्राहट पाते ही गोरों ने बन्दुके भरी और २५. चन्दूको की बाढ़ सर हो गयी। रक्षाकारियों में कितने ही लोग गिर पड़े, मगर कदम पीछे न हटे | वीर मद ने और भी मतवाला कर दिया। एक क्षण में दूसरी बाद पायी; कुछ लोग फिर वीर गति को प्राप्त हुए । लेकिन कुदम आगे बढ़ते हो गये। तीसरी बाढ छूटने ही वाली थी कि लोगों ने विद्रोहियों को जा लिया ! गोरे भागे। जब लोग वादशाह के पास पहुंचे, तो अद्भुत दृश्य देखा। वादशाह रोशनुद्दौला की छाती पर सवार थे। जब गोरे जान लेकर भाग, ता वादशाह ने इस नरपिशाच को पकड़ लिया और उने वल-पूर्वक भूमि पर गिराकर उसका छाती पर बैठ गये। अगर उनके हाथों में हथियार होता, तो इस वक्त रोशन की लाश फड़कती हुई दिखाई देती। राजा बख्तावरसिंह आगे बढ़कर बादशाह को आदाब बजा लाये । लोग: की जय-वनि से श्राकाश हिल उठा। कोई बादशाह के पैरों को चूमता था, कोई उन्हें आशीर्वाद देता था, और रोरानुद्दौला का शरीर तो लातों और धूगर